बुधवार, 16 सितंबर 2020

👉 चुनौती को कौन स्वीकार करे?

यों इस देश में छप्पन लाख धर्म का व्यवसाय करके अपनी रोटी कमाने वाले पेशेवर धर्मसेवक मौजूद हैं जो दान दक्षिण के ऊपर अपना निर्वाह करते हैं और जिनसे स्वभावतः यह आशा की जानी चाहिए कि वे मनुष्य जाति के भौतिक एवं आत्मिक उत्कर्ष में कुछ योग दें। पर उस ओर तो अन्धेरा ही दीखता है। उजाला हमें अपने हृदय का तेल जलाकर करना पड़ेगा। कार्यव्यस्त गृहस्थ लोगों के द्वारा ही अब तक संसार की बड़ी प्रवृत्तियाँ चली हैं। युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं।

अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए हम लोग अपने को साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व  भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?

युग-निर्माण के लिए हमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। जिन दुर्बलताओं और बुराइयों ने जन-मानस पर आधिपत्य जमा रखा है उनकी बुराइयों और हानियों को यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले तो उन्हें छोड़ने कि लिए अवश्य उत्सुक होगा। यदि प्रगति और शान्ति का सच्चा मार्ग उसे विश्वासपूर्वक उपलब्ध हो जाय तो अनैतिक, अपराधपूर्ण, खतरे से भरे हुए दुखदायी रास्ते पर वह क्यों चलेगा? संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुई हैं उनमें सर्वप्रथम विचार विस्तार ही हुआ है। ज्ञान ही क्रिया का पूर्व रूप है। कोई तभी दृश्य रूप में आता है जब पहले वैसे विचार मन में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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