मंगलवार, 8 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २१)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?

पंच वृत्तियों का उल्लेख करने के उपरांत महर्षि पतञ्जलि इनमें पहली वृत्ति प्रमाण के बारे में सुस्पष्टता से समझाते हैं। वह कहते हैं-
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणामि॥ १/७॥

अर्थात् सम्यक् ज्ञान अथवा प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैंः प्रत्यक्ष बोध,अनुमान और योग सिद्ध आप्त पुरुषों के वचन। यही वे तीन विधियाँ हैं, जिनके द्वारा योग साधक को ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है। इनमें पहली विधि प्रत्यक्ष बोध की है। यह सम्यक् ज्ञान का प्रथम स्रोत है। इसका मतलब है, आमने-सामने का साक्षात्कार। ज्ञाता और ज्ञेय के बीच किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं रहती। सत्य को समझाने-बतलाने के लिए किसी दुभाषिये की आवश्यकता नहीं रह जाती।
  
बात बिल्कुल साफ है,सरल और सीधी है। फिर भी अनेकों अड़चनें हैं—इसे समझने में। प्रायः योग सूत्र के भाष्यकारों, वार्तीककारों ने इस सीधी, सरल और साफ बात की बड़ी गलत व्याख्या की है। उन्होंने प्रत्यक्ष बोध को इन्द्रिय बोध की सँकरी सीमा में समेट दिया है। उदाहरण के लिए कई आचार्यों का कहना है कि प्रत्यक्ष वही है-जो आँखों के सामने है। लेकिन यह ठीक-ठीक आमने-सामने कहाँ हुआ? आँखें तो बीच में हैं ही। इसी तरह यदि कुछ सुना जाता है, तो कान माध्यम बनते हैं और ये आँखें या कान गलत खबर भी तो देख सकते हैं। इन्द्रिय बोध-सत्य बोध ही हो,यह कोई जरूरी तो नहीं । इन्द्रियों में थोड़ा सा भी दोष आ गया, तो सारी खबर गलत मिलती हैं। कुछ का कुछ दिखाई-सुनायी देने लगता है।
  
फिर प्रत्यक्ष बोध क्या  है? इस सवाल के उत्तर में परम पूज्य गुरुदेव का चिंतन सूत्र कहता है ‘चेतना प्रत्यक्ष।’ यानि कि हमारी चेतना बिना किसी इन्द्रिय माध्यम के सब कुछ साफ-साफ आमने-सामने देखे। गहरे ध्यान अथवा समाधि की भाव दशा में ही साधक को यह स्थिति प्राप्त होती है। तब देखने के लिए, जानने के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह जाती। किसी इन्द्रिय की तो बिल्कुल भी नहीं। महात्मा बुद्ध, महर्षि रमण, श्री अरविन्द एवं परम पूज्य गुरुदेव जैसे महायोगी इसी रीति से सत्ता और सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति करते हैं। इससे इन्द्रियों की किसी तरह की कोई भागीदारी नहीं होती। ज्ञाता और ज्ञेय एकदम आमने-सामने  होते हैं, उनके बीच कुछ और नहीं होता। केवल प्रत्यक्षता ही सत्य अनुभव बनकर प्रकट होता है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ३९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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