शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग २३)

आखिर कैसे मिले—सम्यक् ज्ञान?
  
पतञ्जलि का कहना है कि सम्यक् ज्ञान के लिए हमें सम्यक् तर्क करना आना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हम इस विराट् सृष्टि को देखें,गौर से निहारें और तर्क का सम्यक् प्रयोग करें, तो ईश्वर के अस्तित्व का अनुमान होता है। यह ठीक है कि ईश्वर की सत्ता इन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं है। ईश्वर कहीं दिखाई नहीं देता, नजर नहीं आता। किन्तु यदि सम्यक् तर्क का प्रयोग करें,यह सोचें  कि विश्व ब्रह्माण्ड की व्यवस्था कितनी सुसंगत है,कितनी उद्देश्यपूर्ण है,तो इस निश्चय पर जरूर पहुँचेंगे कि ईश्वर के रूप में इसकी संचालक सत्ता का भी अस्तित्व होगा। इस तरह सम्यक् तर्क से ईश्वरीय सत्ता का बड़ा ही स्पष्ट अनुमान हो सकता है। बाद में योग साधना के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी पायी जा सकती है।
  
अब है सम्यक् ज्ञान का तीसरा स्रोत-आगम। यह सबसे अधिक सौन्दर्यपूर्ण है। आगम को सम्यक् ज्ञान के स्रोत के रूप में स्वीकारना महर्षि पतञ्जलि की अपनी विशिष्टता है। यह आगम क्या है? तो महर्षि कहते हैं कि आगम महायोगियों के वचन हंै। ये ऋषियों की अनुभति की अभिव्यक्ति देने वाले शब्द है। इस बात को थोड़ा और स्पष्ट रीति से कहें, तो आगम-उन महान् विभूतियों के वचन हैं,जो जान चुके हैं। जो लक्ष्य तक पहुँच चुके हैं,जो कैवल्य ज्ञान को पा चुके हैं, जो ईश्वरीय सत्य का साक्षात्कार कर चुके हैं,उनके शब्द भी सम्यक् ज्ञान का स्रोत है।
  
परम्परा में आगम को वेद कहा जाता है। यह ठीक भी है क्योंकि वेद सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। परन्तु रूढ़ियों से ग्रस्त मूढ़ जन वेद के विराट् स्वरूप को केवल कतिपय मंत्र समुच्चय तक ही समेट देते हैं। यह ठीक नहीं है। आगम सत्य द्रष्टा ऋषियों के वचन है। भले ही संस्कृत में कहा गया हो,अथवा किसी अन्य भाषा में। व्यापक अर्थों में आगम में कबीर की साखी, मीरा के पद, श्रीरामकृष्ण का वचनामृत, महर्षि रमण के वचन, योगीराज अरविन्द का दिव्य जीवन संदेश और स्वयं परम पूज्य गुरुदेव के स्वर सभी कुछ समाहित हो जाता है। इन सत्य द्रष्टा ऋषियों—संतों के वचनों पर श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। योगपथ पर चलने वाले साधकों के लिए सम्यक् ज्ञान का यह तीसरा स्रोत सबसे अधिक  मत्त्वपूर्ण एवं व्यावहारिक है। योग साधना करने वालों के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपने सद्गुरु के वचनों पर परिपूर्ण श्रद्धा-सम्यक् ज्ञान का स्रोत है। सद्गुरु के वचन कभी-कभी बड़े अटपटे होते हैं। परन्तु वे प्रेम लपेटे होते हैं। उन्हें ठीक-ठीक समझ न पाने पर भी यदि कोई साधक उन पर समग्र श्रद्धा के साथ आचरण करने लगता है,तो उसे अपने आप ही सम्यक् ज्ञान हो जाता है।
    
सद्गुरु के वचनों के सम्बन्ध में तर्क का कोई स्थान नहीं है, क्योंकि ये चेतना के जिस तल से कहे गए हैं, वहाँ तर्क, बुद्धि की पहुँच ही नहीं है। यदि इस बारे में तर्क किया जाए, तो हम वह सब गवाँ बैठेंगे, जो हमें हमारे सद्गुरु देना चाहते हैं। क्योंकि वे न केवल यह जानते हैं कि उन्हें हम शिष्यों को क्या देना है? बल्कि वे यह भी जानते हैं कि जो हमारे लिए देने योग्य है,वह सब  किस तरह से देना है। इसलिए केवल और केवल भक्ति पूर्ण श्रद्धा ही एकमात्र उपाय है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि सद्गुरु जो कहें,जिस भी तरह कहें,उसे परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करने पर सम्यक् ज्ञान सुनिश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं। प्रमाणवृत्ति के ये तीनों स्रोत हमारी अन्तर्यात्रा में सहायक है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ ४३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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