शनिवार, 22 अगस्त 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०)

क्या होगा मंजिल पर?

इस जिज्ञासा का अंकुरण सहज है कि चित्तवृत्तियों का निरोध करने वाले योगी की क्या भाव दशा होती है? इसका समाधान करते हुए महर्षि तीसरा सूत्र प्रकट करते हैं। यह तीसरा सूत्र है-
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ १/३॥
  
इस सूत्र का शब्दार्थ कुछ यूँ होगा- तदा=तब (वृत्तियों का निरोध होने पर); द्रष्टुः= द्रष्टा की; स्वरूपे=स्वरूप में; अवस्थानम्=अवस्थिति (होती है)।
  
यह योगी की भावदशा है। चित्तवृत्ति निरोध की योग साधना का सुफल है। किसी भी योग साधक की साधना का लक्ष्य है। महर्षि पतंजलि विश्व भर के मानव इतिहास में सर्वाधिक अनूठे व्यक्तित्व हैं। उन्हें मानव चेतना का सम्यक् ज्ञान है। उनको मनुष्य की कमियों, कमजोरियों, अच्छाइयों व विशेषताओं के बारे में भली प्रकार पता है। उन्हें मानव चेतना की सीमाएँ मालूम हैं, तो सम्भावनाएँ भी ज्ञात हैं। योग सूत्रकार महर्षि इस सच्चाई को अच्छी तरह जानते हैं कि गन्तव्य पता हो, तो ही चलने वाले के पाँवों में गति आती है। उसके मन में हर पल उत्साह उमगता रहता है। लक्ष्य का स्वरूप स्पष्ट होने से ही पथ अर्थवान् होता है, राहें गुणवान् बनती हैं। मंजिल का ही पता न हो, तो भला राही किधर जाएगा? उसके पाँवों की सारी मेहनत मंजिल के अभाव में भटकन की थकन बन कर रह जाएगी।
  
यही वजह है कि महर्षि योग साधक के सामने सबसे पहले उसका लक्ष्य स्पष्ट करते हैं। साधकों को बताते हैं कि तुम्हारा मकसद क्या है? तुम्हारी मंजिल कौन सी है? योग क्या है? और योगी कैसा होता है? यह लक्ष्य ही तो साधना की दिशा है। योग साधक का प्राप्तव्य एवं गन्तव्य है। पहले मंजिल का पता, फिर राह की बातें महर्षि की यही नीति है। इसी कारण वह पहले समाधिपाद के सूत्रों का बयान करते हैं, बाद में साधन- पाद के सूत्र बताते हैं। अन्य दोनों पादों का क्रम इनके बाद आता है। समाधिपाद के इस तीसरे सूत्र में महायोगी महर्षि बताते हैं, चित्त वृत्ति का निरोध हुआ यानि कि मन का शासन मिटा। और तब साधक-सिद्ध हो जाता है। वह योगी बनता है, द्रष्टा बनता है, साक्षी भाव को उपलब्ध होता है। वह स्वयं में, अपने अस्तित्व के केन्द्र में, अपनी आत्मचेतना में अवस्थित हो जाता है।
  
यही बुद्धत्व का अनुभव है। योगियों का कैवल्य है। जीवन में समस्त प्रश्नों का समाधान करने वाली समाधि है। ज्ञानियों की चरम दशा है। विभिन्न साधनाओं के नाना पथ इसी एक लक्ष्य की ओर जाते हैं। योगिवर स्वामी विवेकानन्द ने इसी गन्तव्य पर पहुँचकर गाया था-

सूर्य भी नहीं है, ज्योति-सुन्दर शशांक नहीं,
छाया सा यह व्योम में यह विश्व नजर आता है।
मनोआकाश अस्फुट, भासमान विश्व वहाँ,
अहंकार स्रोत ही में तिरता डूब जाता है।
धीरे-धीरे छायादल लय में समाया जब,
धारा निज अहंकार मन्दगति बहाता है।
बन्द वह धारा हुई, शून्य से मिला है शून्य,
‘अवाङ्गमनसगोचरम्’ वह जाने जो ज्ञाता है।
  
मन के पार यही है—बोध की स्थिति। यही है अपने स्वरूप में अवस्थिति। इसी में स्थित होकर साधक द्रष्टा बनता है, योगी बनता है। कर्म और जीवन का, भाव और विचारों का, देह, प्राण, मन, सृष्टि और समष्टि की समस्त हलचलों का साक्षी बनता है।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ २३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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