शनिवार, 22 अगस्त 2020

👉 न अपराध करें न करने दें

बुरे लोगों के बीच रहते हुए सज्जनों को भी कष्ट ही होता है। जहाँ नर बलि चढ़ाने की प्रथा है उन निर्दय, अविवेकी, जंगली, असभ्य लोगों की बस्ती में रहने वाले भले मानुस को भी अपनी सुरक्षा कहाँ अनुभव होगी? बेचारा डरता ही रहेगा कि किसी दिन मेरा ही नम्बर न आ जाय। गन्दे लोगों के मुहल्ले में रहने वाले सफाई पसंद व्यक्ति का भी कल्याण कहाँ है। चारों ओर गन्दगी सड़ रही होगी बदबू उठ रही होगी तो अपने एक घर की सफाई रखने से भी क्या काम चलेगा? दूसरों के द्वारा उत्पन्न की हुई गन्दगी हवा के साथ उड़कर उस स्वच्छ प्रकृति मनुष्य को भी प्रसन्न न रहने देगी। बाज़ार में हैजा फैले तो स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले भी उसकी चपेट में आते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो अपना छप्पर भी उसकी लपेटों में आता है।

एक गाँव में कुछ लोग साम्प्रदायिक दंगा करें या कोई और उपद्रव करें तो सरकार उसका सामूहिक जुर्माना सारे गाँव पर करती है और शान्तिप्रिय लोगों को भी वह दंड चुकाना होता है। तब शान्तिप्रिय लोगों को भी कानून में निर्दोष नहीं माना जाता। क्योंकि किसी व्यक्ति का इतना ही कर्तव्य नहीं है कि वह शान्ति के साथ सभ्यतापूर्वक स्वयं रहे वरन् यह भी उसका कर्तव्य है कि जो दूसरे उपद्रवकारी हैं उन्हें समझावे या रोके, न रुकते हों तो प्रतिरोध करे। यदि किसी ने अपने तक ही शान्ति को सीमित रखा है, दूसरे उपद्रवियों को नहीं रोका है तो यह न रोकना भी नागरिक शास्त्र के अनुसार, मानवीय कर्तव्य शास्त्र के अनुसार एक अपराध है और उस अपराध का दंड यदि सामूहिक जुर्माने के रूप में वसूल किया जाता है तो उस शान्तिप्रिय व्यक्ति की यह दलील निकम्मी मानी जायगी कि मैं क्या करूँ? मेरा क्या कसूर है? कोई मैंने थोड़े ही अपराध किया है।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि स्वयं अपराध न करना ही हमारी निर्दोषिता का प्रमाण नहीं है। अपराधों और बुराइयों को रोकना भी प्रत्येक सभ्य एवं प्रबुद्ध नागरिक का कर्तव्य है। यदि किसी की आँखों के आगे हत्या, लूट, चोरी, बलात्कार, आदि नृशंस कृत्य होते रहें और वह मौन पत्थर की तरह चुपचाप खड़े देखते रहें, कोई प्रतिरोध न करें तो यह निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता भी कानूनन अपराध मानी जायगी और न्यायाधीश इस जड़ता के लिए भी दंड देगा। इसे कायरता और मानवीय कर्त्तव्यों की उपेक्षा माना जाएगा। गाँवों में जिनके पास बन्दूकें रहती हैं उनका यह कर्तव्य भी हो जाता है कि यदि गाँव में दूसरों के यहाँ डकैती पड़े तो डाकुओं से मुकाबला करने के लिए उन बन्दूकों का उपयोग करें। यदि वे बन्दूक वाले डर के मारे अपने घरों में चुपचाप जान बचाये बैठे रहें और डकैती बिना प्रतिरोध पड़ती रहे तो इस काण्ड में डकैतों की तरह उन डरपोक बन्दूकधारियों को भी अपराधी माना जाएगा और सरकार उनकी बन्दूकें जब्त कर लेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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