सोमवार, 17 अगस्त 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५)

प्रवेश से पहले जानें अथ का अर्थ
  
‘अथ योगानुशासनम्’ के सूत्र का सार यही है- शिष्यत्व का जन्म और सद्गुरु की प्राप्ति। शिष्यत्व और सद्गुरु जब मिलते हैं- तभी योग साधना का प्रारम्भ होता है। अन्तर्यात्रा का विज्ञान जन्म लेता है। अस्तित्व में अनूठे प्रयोग शुरू होते हैं। महर्षि पतंजलि के इस प्रथम सूत्र को जो नहीं समझ पाते, योग साधना का प्रवेश द्वार उनके लिए कभी भी नहीं खुलता। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में भी यह द्वार इसी रीति से खुला था। ‘अथ’ शब्द की समझ ने, और योग अनुशासन की स्वीकार्यता ने ही उन्हें महायोगी बनाया। अपने सुदीर्घ साधनामय जीवन का निष्कर्ष बताते हुए उन्होंने लिखा- अध्यात्म एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। इसके प्रयोगों के लिए हमें एक सच्चे वैज्ञानिक की भाँति सत्यान्वेषी बनना होगा। अध्यात्म की भाषा में शिष्यत्व ही इसका पर्याय और कसौटी है।
  
इन पंक्तियों को पढ़कर अपनी योग साधना प्रारम्भ करने वाले साधकों के लिए इस सूत्र की साधना के व्यावहारिक बिन्दु निम्न है- १. इस समझ को आत्मसात करना ही योग सत्य की प्राप्ति है, सिद्धि की प्राप्ति नहीं। २. ‘अथ का पुण्य क्षण’ लाने के लिए गुरुदेव को पुकारना, उनकी कृपा का आह्वान करना। ३. योग के प्राथमिक अनुशासन के रूप में किसी सुखप्रद आसन (सुखासन, पद्मासन आदि) पर देर तक बैठकर गायत्री महामंत्र को जपने का अभ्यास, ४. इस विवेक पथ का अनुशीलन करके भी यदि अभी तक हमें योग की अनुभूति नहीं हो सकी है, तो इसका एक मात्र कारण यह है कि अपनी पात्रता अभी परिपक्व नहीं है, इसे परिपक्व करने के प्रयास में प्राणपण से जुटना।
  
इस सम्बन्ध में और अधिक व्यावहारिक ज्ञान पाने के लिए शान्तिकुञ्ज पत्र लिखकर परामर्श किया जा सकता है। अथवा फिर यहाँ नियमित रूप से संचालित होने वाले साधना सत्रों में भागीदारी करके अपनी जिज्ञासा का समाधान पाया जा सकता है। योग अपने आप में क्या है? इसे अच्छी तरह से जाने बिना इसकी सच्ची साधना असम्भव है। पर आत्मा में शिष्यत्व के जन्म के बिना यह जाना भी नहीं जा सकता।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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