सोमवार, 17 अगस्त 2020

👉 भीतरी गन्दगी की दुर्गन्धित सड़न

आलसी और अव्यवस्थित, छिद्रान्वेषी और उद्विग्न मनुष्य के लिए यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा हैं और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते हैं, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नहीं। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रतिक्रिया में चिर−अशान्ति उनके पल्ले बँध जाती है।

मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में मनुष्य का और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव−जीवन में श्रेष्ठता है उस सब को चुपके−चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक का समझ भी तो नहीं पाता। वह बाहर ही बाहर कारणों को ढूँढ़ता रहता है; कभी इस पर कभी उस पर दोष मड़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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