मंगलवार, 18 अगस्त 2020

👉 मानसिक स्वच्छता का महत्व

काश, मनुष्य मन की स्वच्छता का महत्व समझ पाया होता तो उसका जीवन कितने आनंद और उल्लास के साथ व्यतीत हुआ होता दूसरों की श्रेष्ठता को देखने वाली, उसमें अच्छाइयाँ तलाश करने वाली यदि अपनी प्रेम−दृष्टि जग पड़े तो बुरे लोगों में भी बहुत कुछ आनन्ददायक, बहुत कुछ अच्छा, बहुत कुछ अनुकरणीय हमें दीख पड़े। दत्तात्रेय ऋषि ने जब अपनी दोष−दृष्टि त्याग कर श्रेष्ठता ढूँढ़ने वाली वृत्ति जागृत कर ली तो उन्हें चील, कौए, कुत्ते, मकड़ी, मछली जैसे तुच्छ प्राणी भी गुणों के भाण्डागार दीख पड़े और वे ऐसे ही तुच्छ जीवों को अपना गुरु बनाते गये, उनसे बहुत कुछ सीखते गये।

हम चाहें तो चोरों से भी सावधानी, सतर्कता, साहस, लगन, ढूँढ़ खोज जैसे अनेक गुणों को सीख सकते हैं। इस दृष्टि से वे हम से कहीं अधिक आगे होते हैं। पाप की उपेक्षा कर पुण्य को और अशुभ की उपेक्षा कर शुभ को तलाश करने का हमारा स्वभाव यदि बन जाय तो इस संसार में हमें सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर चमकता नजर आवे। उसकी इस पुण्य कृति में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द झरता दीखने लगे। सारी दुनियाँ हमारे लिए उपकार, सहयोग, स्नेह और सद्भावना का उपहार लिए खड़ी है, पर हम उसे देख कहाँ पाते हैं। मन की मलीनता तो हमें केवल दुर्गन्ध सूँघने और गंदगी और ढूँढ़ने के लिए ही विवश किये रहती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

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