मंगलवार, 28 जुलाई 2020

👉 विरोध न करना पाप का परोक्ष समर्थन (भाग ४)

यज्ञ सन्दर्भ में एक श्रुति वचन प्रयोग होता है- ‘‘मन्यु रसि मन्यु मे दहि’’ हे भगवान् आप ‘मन्यु’ हैं हमें ‘मन्यु’ प्रदान करें। मन्यु का अर्थ है वह क्रोध जो अनाचार के विरोध में उमंगता है। निन्दित क्रोध वह है जो व्यक्तिगत कारणों से अहंकार की चोट लगने पर उभरता है और असंतुलन उत्पन्न करता है। किन्तु जिसमें लोक-हित विरोधी अनाचार को निरस्त करने का विवेकपूर्ण संकल्प जुड़ा होता है वह ‘मन्यु’ है। मन्यु में तेजस्विता, मनस्विता और ओजस्विता के तीनों तत्व मिले हुए हैं। अस्तु वह क्रोध के समतुल्य दीखने पर भी ईश्वरीय वरदान के तुल्य माना गया है और उसकी गणना उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों से की गई है।

राजा द्रुपद के अनाचारों से क्षुब्ध उनके सहपाठी, द्रौणाचार्य राज सभा में इसलिए गये कि अपनी बात मित्रता का परिचय देते हुए उसके शुभ-चिंतन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे। पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभा भवन में से निकलवा दिया।
 
द्रौणाचार्य ने विवेक नहीं खोया। द्रुपद समझाने की सज्जनोचित रीति से नहीं मानते तो उन्हें दण्ड की दुर्जनों पर प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया का सहारा लेंगे। हर हालत में उन्हें सीधे रास्ते पर लाने का प्रयत्न जारी रखेंगे। इस निश्चय से साथ वे पाण्डवों को पढ़ाने लग गये। जब छात्र बड़े हुए और गुरु दक्षिणा देने की बात कही तो उनने एक ही उत्तर दिया कि- ‘‘द्रुपद के अहंकार को नीचे गिराना और उसे सुधारना है, इसलिए उसे पकड़ कर मुख बांधकर मेरे सामने ले आओ।’’ शिष्यों ने वही किया। द्रुपद पर आक्रमण हुआ। उन्हें हराया गया और रस्सों से जकड़ कर गुरु के सामने प्रस्तुत किया गया। द्रौणाचार्य ने कहा- ‘राजन् अहंकार और अनीति अभी भी छोड़ी जानी है या नहीं?’ द्रुपद रो पड़े उनने दोनों दुष्टताएं छोड़ दीं। साथ ही स्वयं भी बन्धन मुक्त हो गये। महाभारत की इस कथा में यह प्रेरणा है कि दुष्टता से उभरने पर मौन नहीं बैठे रहना चाहिए। मीठे उपाय सफल न हों तो कडुए भी अपनाये जा सकते हैं। हर हालत में अनाचार का तो अंत होना ही चाहिए।

वैयक्तिक पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में छद्मवेशों से छिपे हुए भ्रष्टाचार का अंत तब तक नहीं हो सकता, जब तक उनके प्रति जन-आक्रोश न जगाया जाय। आज तो स्थिति यह हो गई है कि उचित-अनुचित का भेद तक करना, लोग भूलते जाते हैं और किसके साथ सहयोग करना, किसके साथ न करना इस विवेक को खो जाते हैं। जिसके साथ जिसकी मित्रता है, वह उसके पाप अनाचार का भी चित्र-विचित्र तर्कों से समर्थन करता है। नैतिक दृष्टि से यह अत्यन्त ही दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है। मित्रता के प्रमुख लक्षणों में रामायण कार ने ‘‘कुपथ निवार सुपंथ चलावा’’ का सूत्र दिया है। सच्चा मित्र वह है जो मीठे, कडुए उपायों से उसकी अनैतिक प्रवृत्तियों को सुधारें, गलत मार्ग पर चलने से रोकें और सन्मार्ग की दिशा में प्रवृत्त करें, जो उसकी उपेक्षा बरतता है अथवा समर्थन, सहयोग करता है, वह प्रकारान्तर से अपने मित्र को अधिक भ्रष्ट करने में- अधिक पतित, निन्दित एवं दुःखों के गर्त में डुबाने के लिए प्रवृत्त है। ऐसा व्यक्ति मित्र होने का दावा करते हुए भी असल में उसका पक्का दुश्मन है। सुधार प्रक्रिया में यह समर्थन ही सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे मित्र नामधारी, व्यक्ति अपने मित्र के साथ ही अपना भी लोक-परलोक बिगाड़ते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर १९७६

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