सोमवार, 7 अक्तूबर 2019

👉 जन्म दिन मनाने की परिपाटी

युग निर्माण परिवार के सदस्यों में प्रेम परिचय बढ़े। घनिष्ठता स्थापित हो उसके लिये जन्म दिन मनाने की परम्परा विकसित की जाय। अपने व्रतधारी और सामान्य सदस्यों का जन्म दिन किस तारीख को पड़ता हे, इसका वर्ष के 365 दिनों का अनुक्रम से रजिस्टर तैयार कर लिया जाये तथा उसकी एक एक कार्बन कापी अथवा छपी कापी प्रत्येक सदस्य के पास रहे, ताकि उस दिन नियमित रूप से हर सदस्य उस सदस्य के घर बिना स्मरण दिलाये पहुँच जाया करे। जन्म दिवसोत्सवों में परिचितों, पड़ोसियों और सम्बन्धियों को भी अलग से आमंत्रित किया जाता रहे, इससे कुछ ही समय में सैकड़ों नये व्यक्तियों तक मिशन का प्रकाश अनायास ही पहुँच सकता है।

तैयारी सर्वत्र एक सी रहे इस परम्परा को लोकप्रिय बनाया जाना है, अतएव निर्धन और धनी वर्ग सब सीमित खर्च उठाये। पूजन सामग्री एवं उपकरणों की व्यवस्था शाखा अथवा टोली में रहे। स्वागत सत्कार में भी न्यूनतम खर्च हो। प्रसाद के लिये चीनी की गोली, चिनौरियाँ और सत्कार के लिये कटी सुपारी, तली-भुनी सौंफ पर्याप्त है। सम्भव हो तो, यह व्यवस्था भी शाखा में विद्यमान रहे। समय, प्रातः काम पर जाने से पूर्व, अन्यथा रात को रखा जाये और इतने समय से उसे सम्पन्न कर लिया जाये कि घर लौटने, काम पर जाने या रात्रि विश्राम में विलम्ब न हो।

एक घण्टे में यज्ञादि धर्मानुष्ठान, आधा घण्टा संगीत एक घण्टा प्रवचन प्रतिज्ञा, इस प्रकार दो ढाई घण्टे पर्याप्त है। सर्वतोमुखी पवित्रता का जल अभिसिंचन, पूजा वेदी पर देव पूजन, स्वस्ति वाचन, संक्षिप्त हवन, उपस्थित लोगों द्वारा शुभकामना, अक्षत पुष्प उपहार, अभिवादन, आशीर्वाद, भजन कीर्तन, प्रवचन, मार्गदर्शन जल इलाइची से सत्कार इतना कार्यक्रम पर्याप्त है। पूजा के मंत्र सभी पढ़े लिखे पुस्तकों से सामूहिक रूप से बोले। प्रवचन कर्ता कई तरह के प्रवचन तैयार रखे, ताकि यदि एक ही दिन कई जन्म दिन मनाने पड़े तो भी रुचि भिन्नता बनी रहे। अपने स्त्री बच्चों तथा मुहल्ले के जन्म दिन लोग स्वयं मनायें, उसमें शाखा सदस्यों का समय नहीं लगना चाहिए। इस तरह इस परम्परा के द्वारा पारस्परिक स्नेह सद्भाव के विकास का सुर सुलभ मनुष्य शरीर का लाभ किस प्रकार लिया जा सकता हे, थोड़े में ही यह उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।

जन्म दिन संस्कार से पारिवारिक स्नेह सद्भाव की वृद्धि और व्यक्ति निर्माण की आवश्यकता पुरी होती है, जन समुदाय को भी यह लाभ देने की दृष्टि से प्रत्येक शाखा को (1) आदर्श वाक्य लेखन (2) चल पुस्तकालय (3) धर्म फेरी तीर्थयात्रा-यह तीन कार्य क्रम अनिवार्य रूप से चलाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५५

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