शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

👉 उत्तरदायित्व समझें और निवाहें-

पुनर्गठन के साथ साथ सदस्यों को कुछ निश्चित उत्तरदायित्व सौंपे गये है। पत्रिकाएँ मँगाने वालों से अनुरोध किया गया है कि वे उन्हें स्वयं तो ध्यान से पढ़े ही, साथ ही दस नहीं तो न्यूनतम पाँच अन्य व्यक्तियों को भी पढ़ाने या सुनाने का भाव भरा श्रमदान तो करते ही रहें। हर सदस्य ज्ञान यज्ञ में इतना तो योगदान करे ही, ताकि हर अंक से कई व्यक्ति लाभ उठायें और मिशन का सन्देश अधिक क्षेत्र में फैलता चला जाय।

जो अंशदान करने का व्रत ले चुके है, उन्हें न्यूनतम 10 पैसा (आज १ रुपया) एवं एक घण्टा समय नित्य बचाकर मिशन के प्रसार में लगाना चाहिए। अपने संपर्क क्षेत्र में झोला पुस्तकालय चलाना इसका सर्वश्रेष्ठ ढंग है। विचारशील व्यक्तियों की सूची तैयार कर ली जाय। किस दिन किस के यहाँ जाना है ? यह क्रम बना लिया जाय। ज्ञान घट के संचित धन से मिशन का साहित्य खरीदा जाय, पुरानी पत्रिकाओं पर कवर लगाकर उनका भी उपयोग किया जाय।

इतने से ही घर घर ज्ञान सिंचन का क्रम चल सकता है। घर बैठे, बिना मूल्य नव जीवन देने वाली ज्ञान गंगा का लाभ भला कौन न उठायेगा? जरूरत इतनी भर है कि साहित्य जबरदस्ती थोपा न जाय, उसका महत्व समझाते हुए, पाठक की रुचि जगाते हुए उसे पढ़ने का अनुरोध किया जाय। जैसे जैसे रुचि बढ़े वैसे वैसे अधिक महत्त्वपूर्ण साहित्य देने का सिलसिला चलाया जाय।

संपर्क क्षेत्र में झोला पुस्तकालय चलाने के लिए बहुत समय से आग्रह किया जाता रहा है। जिनने नव निर्माण की विचारधारा का महत्व समझा वे आलस्य, प्रमाद के संकीर्ण अहंकार को आड़े नहीं आने देते वरन् इस परमार्थ में तत्पर रहते हुए आत्म गौरव एवं आन्तरिक सन्तोष का अनुभव करते हैं। ज्ञान के कर्म में परिणत होने का यह प्रथम चरण है कि ज्ञान यज्ञ को-विचार क्रांति को समर्थ बनाने के लिए अपने समय एवं साधन का नियमित अनुदान प्रस्तुत करते रहा जाय। झोला पुस्तकालय चलाने के लिए ज्ञान घट की स्थापना और एक घण्टा समय तथा दस पैसा नित्य का अनुदान देना, देखने में कितना ही सरल एवं स्वल्प क्यों न हो, पर हमारे सन्तोष के लिए उतना भी बहुत है। ऐसे व्रतधारी कर्मनिष्ठ परिजनों से आज नहीं तो कल हम बड़ी बड़ी आशाएँ करना आरम्भ कर सकते हैं। उनका दर्जा स्वभावतः ऊँचा है। मात्र ज्ञान का शुभारम्भ है। कर्म के साथ संयुक्त हो जाने पर उस बीज को वृक्ष बनाने का आश्वासन देने वाला अंकुर कह सकने में हमें किसी प्रकार का संकोच नहीं है।

दस पैसा (आज १ रुपया) और एक घण्टे की न्यूनतम शर्त भावनापूर्वक पूरी करने वालों का स्तर निश्चित रूप से विकसित होता चलेगा। अपने अन्दर बढ़ते हुए देवत्व की प्रखरता के आधार पर वे दिव्य प्रयोजन के लिए क्रमशः बड़े अनुदान प्रस्तुत करने का गौरव प्राप्त कर सकेंगे। माह में एक दिन की आय तथा प्रतिदिन 4 घण्टे का समय देना और अन्ततः कर्मयोगी वानप्रस्थ के स्तर तक पहुँच जाना उन्हीं के लिए सम्भव हो सकेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५३
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1977/July/v1.53

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