शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७२)

👉 संयम है प्राण- ऊर्जा का संरक्षण, सदाचार ऊर्ध्वगमन

अभी कुछ दिनों पूर्व साइकोन्यूरो इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में एक प्रयोग किया गया। यह प्रयोग दो विशिष्ट वैज्ञानिकों आर. डेविडसन और पी. एरिकसन ने सम्पन्न किया। इस प्रयोग में उन्होंने चार सौ व्यक्तियों को लिया। इसमें से २०० व्यक्ति ऐसे थे, जिनकी अध्यात्म के प्रति आस्था थी जो संयमित एवं सदाचार परायण जीवन जीते थे। इसके विपरीत २०० व्यक्ति इनमें इस तरह के थे जिनका विश्वास भोगविलास में था, जो शराबखानों व जुआघरों में अपना समय बिताते थे। जिनकी जीवनशैली अस्त- व्यस्त थी। इन दोनों तरह के व्यक्तियों का उन्होंने लगातार दस वर्षों तक अध्ययन किया।

अध्ययन की इस प्रक्रिया में उन्होंने देखा कि जो व्यक्ति संयम, सदाचार पूर्वक जीते हैं, वे बीमार कम होते हैं। उनमें मानसिक उत्तेजना, उद्वेग एवं आवेग बहुत कम होते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः तनाव, दुश्चिंता से मुक्त होते हैं। यदि इन्हें कोई बीमारी हुई भी तो ये बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। चाट लगने पर या ऑपरेशन होने पर उनकी अपेक्षा इनके घाव जल्दी भर जाते हैं। इसके विपरीत असंयमित एवं विलासी मनोभूमि वालों की स्थिति इनसे ठीक उलटा पायी गयी। इनकी जीवनी शक्ति नष्ट होते रहने के कारण इन्हें कोई न कोई छोटी- मोटी बीमारियाँ हमेशा घेरे रहती हैं। छूत की बीमारियों की सम्भावना इनमें हमेशा बनी रहती है। तनाव, दुश्चिंता, उत्तेजना, आवेग तो जैसे इनका स्वभाव ही होता है। कोई बीमारी होने पर अपेक्षाकृत ये जल्दी ठीक नहीं होते। एक ही बीमारी इन्हें बार- बार घेरती रहती है। चोट लगने या ऑपरेशन होने पर इनके घाव भरने में ज्यादा समय लगता है। इस स्थिति को एक दशक तक परखते रहने पर डेविडसन व एरिकसन ने यह निष्कर्ष निकाला कि संयम- सदाचार से व्यक्ति में प्रतिरोधक क्षमता में असाधारण वृद्धि होती है। इसी कारण उनमें शारीरिक व मानसिक रोगों की सम्भावना कम रहती है। यदि किसी तरह से कोई रोग हुआ भी तो इनसे छुटकारा जल्दी मिलता है।

इस क्रम में इस वैज्ञानिक दृष्टि की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि कहीं ज्यादा गहरी व सूक्ष्म है। हमने परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में इस सत्य की अनुभूति पायी है। अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने तो केवल अपने संकल्प से अनगिनत लोगों को रोग मुक्त किया। पर अखण्ड ज्योति संस्थान के निवास काल में रोग निवारण की इस प्रक्रिया को वे थोड़े अलग ढंग से सम्पन्न करते थे। इसके लिए वे रोगी का पहना हुआ कपड़ा माँगते थे, और उसके प्राणों के सूक्ष्म परमाणुओं का परीक्षण आध्यात्मिक रीति से करते थे। बाद में स्थिति के अनुरूप उसकी चिकित्सा करते थे।

ऐसे ही एक बार उनसे गुजरात के देवेश भाई ने अपने किसी रिश्तेदार के बारे में उन्हें लिखा। ये रिश्तेदार कई बुरी आदतों का शिकार थे। हालाँकि इनका स्वास्थ्य काफी अच्छा था। गुरुदेव ने देवेश भाई से इनका पहना हुआ कपड़ा मँगाया। कपड़े के आध्यात्मिक परीक्षण के बाद उन्होंने देवेश भाई को चिट्ठी लिखी कि तुम्हारे इन रिश्तेदार के जीवन के दीये का तेल चुक गया है और अब शीघ्र ही इनकी ज्योति बुझने वाली है। गुरुदेव के इस पत्र पर देवेश भाई को यकीन ही नहीं हुआ। क्योंकि ये रिश्तेदार तो पर्याप्त स्वस्थ थे। देवेश भाई गुरुदेव की इस चिट्ठी को लेकर सीधे मथुरा पहुँचे। सामने मिलने पर भी गुरुदेव ने अपनी उन्हीं बातों को फिर से दुहराया। सभी को अचरज तो तब हुआ जब ये रिश्तेदार महोदय पंद्रह दिनों बाद चल बसे। इस पर गुरुदेव ने उन्हें पत्र लिखकर कहा- यदि जीवनीशक्ति बिल्कुल भी न बची हो और संयम- सदाचार की अवहेलना के कारण जीवन के पात्र में छेद ही छेद हैं; तो आध्यात्मिक चिकित्सा असम्भव है। आध्यात्मिक चिकित्सा के लिए आध्यात्मिक जीवनशैली को अपनाना बेहद जरूरी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०१

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