शनिवार, 17 अगस्त 2019

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ५०)

👉 व्यक्तित्व की समग्र साधना हेतु चान्द्रायण तप

तप के प्रयोग अद्भुत हैं और इनके प्रभाव असाधारण। इन्हें व्यक्तित्व की समग्र चिकित्सा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। चिकित्सा के अभाव में रोगी शक्तिहीन, दुर्बल, निस्तेज रहता है। लेकिन चिकित्सा के प्रभाव से उसकी शक्तियाँ क्रियाशील हो जाती हैं। दुर्बलता सबलता में बदलती है और व्यक्तित्व का तेजस् वापस लौट आता है। ये परिवर्तन तो सामान्य चिकित्सा क्रम के हैं, जो अपेक्षाकृत आँशिक एवं एकाँगी होते हैं। तप में तो इस प्रक्रिया की स्वाभाविक समग्रता झलकती है। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य एवं बाह्य परिस्थितियाँ सँवरती हैं, बल्कि आन्तरिक जीवन का भी परिमार्जन- परिष्कार होता है। इस प्रक्रिया से अन्तर्चेतना का समूचा साँचा बदल जाता है। रूचियाँ, प्रवृत्तियाँ, चिंतन की दशा और दिशा सभी रूपान्तरित हो जाते हैं। रोग कोई भी हो, तप के प्रयोगों से इनका अचूक समाधान होता है।

ऐसे अद्भुत व आश्चर्यकारी प्रभावों के बावजूद तप के प्रयोगों के बारे में अनेकों भ्रान्तियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग भूखे रहने को तप मानते हैं, तो कुछ के लिए सिर के बल खड़े होना या एक पाँव के बल पर बहुत समय तक खड़े रहना तप है। ऐसे लोग न तो यह जानते हैं कि तप क्या है? और न उन्हें यह मालूम है कि उन्हें क्यों व किसलिए करना है? इस सम्बन्ध में कुछ की भ्रान्ति तो इतनी गहरी होती है कि वह कुछ उल्टी- सीधी क्रियाएँ करके लोगों को रिझाने को ही तप मान लेते हैं। जबकि वास्तविक अर्थों में किसी तरह के पाखण्ड और आडम्बर का तप से कोई लेना- देना नहीं है। यह तो विशुद्ध रूप से व्यक्तित्व की समग्र चिकित्सा की वैज्ञानिक पद्धति है।

इस समूची प्रक्रिया के तीन चरण हैं- १. संयम, २. परिशोधन, ३. जागरण। ये तीनों ही चरण क्रमिक होने के साथ एक- दूसरे पर आधारित हैं। इनमें से पहले क्रम में संयम तप की समूची प्रक्रिया का आधार है। इसी बिन्दु से तप के प्रयोग का प्रारम्भ होता है। इस प्रारम्भिक बिन्दु में तपस्वी को अपनी सामान्य जीवन ऊर्जा का संरक्षण करना होता है। वह उन नीति- नियमों व अनुशासनों का श्रद्धा सहित पालन करता है जो क्रिया, चिंतन एवं भावना के झरोखे से होने वाली ऊर्जा की बर्बादी को रोकते हैं। इस सच्चाई को हम सभी जानते हैं कि स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी तरह की परेशानियाँ चाहे वे शारीरिक हो या फिर मानसिक किसी न किसी तरह के असंयम के कारण होती हैं। असंयम से जीवन की प्रतिरोधक शक्ति में कमी आती है और बीमारियाँ घेर लेती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ७१

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