शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Aug 2019

■  मनुष्य का अज्ञान तब स्पष्ट समझ में आ जाता है, जब वह अपनी ही हुई भुलों और उनके परिणाम के लिए ईश्वर को दोषी ठहराता है, शताब्दियों से सन्त-महात्मा चिल्ला-चिल्ला कर कहते आये हैं कि मनुष्य को सदा अच्छे काम ही करना चाहिए और बुरे काम छोड़ देना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया है कि कौन-सा काम अच्छा है और कौन-सा काम बुरा।
 
◇ यदि शान्ति धन में भोग-विलास में अर्थात सांसारिक वस्तुओं में नहीं है और न तो संसार से विरक्त एवं वैराग्य में ही है तो शान्ति है कहाँ? अरेए शान्ति के इच्छुक यदि शान्ति की अभिलाषा करते हो तो तनिक दूसरी ओर भी दृष्टि डालो । देखो शान्ति तो अपने हृदय में अपने कर्म एवं कर्त्तव्य में विराजमान है।   

★ संयम से रहो। हृदय में सद्गुणों को स्थान दो। मन की चंचलता दूर करों। चित्त को एकाग्र करने का अभ्यास करो। तुम्हारे अन्दर जो शक्तियाँ गुप्त है वे प्रकट होंगी। चर्म-चक्षुओं की सहायता के बिना तुम देख सकोगे। बिना कानों से सुन सकोगे। तुम अपने मन से ही सीधे देखने और सुनने की क्षमता प्राप्त कर लोगे।

◇ संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ईश्वर का चिन्तन भी करने से सच्ची शान्ति प्राप्त हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तवयों का पालन न करे, अपने आश्रितों की रक्षा एवं देख-रेख न करे तथा घर-बार छोड़कर दूर घनघोर जंगल में आकर तपस्या करे तो उसी सच्ची शान्ति का अनुभव नहीं हो सकता भले ही वह ज्ञानी हो जाय, ब्रह्म को समझ ले किन्तु उसे सच्ची शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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