शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

👉 योजना का दूसरा चरण संगठनात्मक

योजना का दूसरा चरण संगठनात्मक है। भीड़ का संगठन बेकार है। मुर्दों का पहाड़ इकट्ठा करने से तो बदबू ही फैलेगी। जिनके मन में कसक है जो वस्तुस्थिति को समझ चुके है उन्हीं का एक महान् प्रयोजन के लिए एकत्रीकरण वास्तविक संगठन कहला सकता है। युग-निर्माण परिवार संगठन में अब वे ही लोग लिये जा रहे है जो ज्ञान-यज्ञ के लिए दस पैसे और एक घण्टा समय देने के लिये निष्ठा और तत्परता दिखाने लगे है कर्मठ लोगों का संगठन बन जाने पर प्रचारात्मक अभियान को सन्तोषजनक स्तर तक पहुंचा देने पर ऐसी स्थिति आ जायेगी कि जो अति महत्व पूर्ण इन दिनोँ शक्ति एवं स्थिति के अभाव में कर नहीं पा रहे है वे आसानी से किये जा सकें।

सृजनात्मक और संघर्षात्मक कार्यक्रम की हमें अति विशाल परिमाण पर तैयारी करनी होगी। इन दिनों तो उनकी चर्चा मात्र करते हैं बहुत जोर नहीं देते क्योंकि जिस लोक-समर्थन के लिए प्रचार और कार्य कर सकने के लिए जिस संगठन की आवश्यकता है वे दोनों ही तत्व अपने हाथ में उतने नहीं है जिससे कि अगले कार्यों को सन्तोष-जनक स्थिति में चलाया जा सके। पर विश्वास है कि प्रचार और संगठन का पूर्वार्ध कुछ ही दिन में संतोष जनक स्तर तक पहुंच जायेगा तब हम सृजन और संघर्ष का विशाल और निर्णायक अभियान आसानी से छेड़ सकेंगे और उसे सरलता पूर्वक सफल बना सकेंगे।

सृजन एक मनोवृत्ति है, जिससे प्रभावित हर व्यक्ति को अपने समय के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए कुछ न कुछ कार्य व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से निरन्तर करना होता है। उसके बिना उसे चैन ही नहीं मिलता। किस परिस्थिति का किस योग्यता का व्यक्ति नवनिर्माण के लिए क्या रचनात्मक कार्य करें यह स्थानीय आवश्यकताओं को देख कर ही निर्णय किया जा सकता है। युग-निर्माण योजना के ‘शत-सूत्री’ कार्यक्रमों में इस प्रकार के संकेत विस्तार पूर्वक किये गये है। रात्रि पाठशालायें प्रौढ़ पाठशालायें, पुस्तकालय, व्यायामशालायें स्वच्छता, श्रमदान, सहकारी संगठन, सुरक्षा शाक, पुष्प, फल उत्पादन आदि अनेक कार्यों की चर्चा उस संदर्भ में की जा चुकी है। प्रगति के लिये यह नितान्त आवश्यक है कि हर नागरिक में मन में यह दर्द उठता रहे कि विश्व का पिछड़ापन दूर करने के लिए-सुख-शान्ति की सम्भावनायें बढ़ाने के लिये उसे कुछ न कुछ रचनात्मक कार्य करने चाहिए। यह प्रयत्न कोटि-कोटि हाथों, मस्तिष्कों और श्रम सीकरों से सिंचित होकर इतने व्यापक हो सकते हैं कि सृजन के लिए सरकार का मुँह ताकने और मार्ग दर्शन लेने की कोई आवश्यकता ही न रह जाय।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति, जून १९७१, पृष्ठ ६१

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/June/v1.61

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