सोमवार, 5 नवंबर 2018

👉 साधना- अपने आपे को साधना (भाग 3)

🔷 अपनी जन्म−जात ईश्वर प्रदत्त अनेकानेक अद्भुत किन्तु प्रसुप्त विशेषताओं और विभूतियों को जागृत करना भी अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य है। उसमें लगता भर ऐसा है मानो बाहर के किसी देवी−देवता को प्रसन्न करने के लिए अनुनय विनय की, भेंट उपहार की, गिड़गिड़ाहट भरी दीनता की, अभिव्यक्ति की जा रही है और साधक उसी का ताना−बाना बुनता है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। देवी−देवताओं को अपने निजी कार्य उत्तरदायित्व और झंझट भी तो कम नहीं होंगे। हमारी ही तरह वे भी अपने निजी गोरख−धन्धे में लगे होंगे। जब हमें अपने थोड़े से सगे−संबंधियों की सहायता ठीक तरह करते नहीं बन पड़ती तो असंख्य भक्त उपासकों की चित्र−विचित्र मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए दौड़े−दौड़े फिरना उनके लिए भी कठिन ही पड़ेगा और वे सम्भवतः उतना कर भी न पायेंगे जितनी कि अपेक्षा की जाती है।

🔶 साधना का क्षेत्र अन्तःजगत है। अपने ही भीतर इतने खजाने दबे पड़े हैं कि उन्हें उखाड़ लेने पर ही कुबेर जितना सुसंपन्न बना जा सकता है। फिर किसी बाहर वाले से माँगने जाँचने की दीनता दिखाकर आत्म−सम्मान क्यों गँवाया जाय? भीतरी विशिष्ट क्षमताओं को ही तत्वदर्शियों ने देवी−देवता माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अन्तः संस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान बताया है। शारीरिक बल वृद्धि के लिए डम्बल, मुद्गर उठाने घुमाने जैसे कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं। बल इन उपकरणों में कहाँ होता है? वह तो शरीर की मांस पेशियों से ही उभरता है। उस उभार में व्यायामशाला के साधन−प्रसाधन सहायता भर करते हैं। उनसे मिलना कुछ नहीं। जो मिलना है वह भीतर से ही मिलना है। ठीक यही बात आत्म−साधना के संबंध में भी कही जा सकती है। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त होने वाले देवी−देवता एवं विधि−विधान अपनी जेब से कुछ नहीं देते। साधक की निष्ठा भर पकाते हैं उसे कार्य−पद्धति भर सिखाते हैं। इतने का अभ्यस्त बनना ही साधनात्मक कर्मकाण्डों का प्रयोजन है। इतने भर से बात बन जाती है और राह मिल जाती है। साधक अपनी मूर्छना जगाकर उज्ज्वल भविष्य की असीम सम्भावनाएं स्वयं जगा लेता है।

🔷 आत्म−चेतना की जागृति ही साधना विज्ञान का लक्ष्य है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्तव्य का बिखराव रोककर अभीष्ट प्रयोजन के केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इसके लिए अपनी गति विधियाँ लगभग उसी स्तर की रखनी पड़ती हैं जैसे कि भौतिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले लोगों को अपनानी होती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1976 पृष्ठ 12

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1976/January/v1.12

👉 संदेह के बीज

🔷 एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया? सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं! उस...