मंगलवार, 7 अगस्त 2018

👉 जिन्दगी जीने की समस्या (भाग 2)

🔷 प्राचीन काल में हमारे पूर्वज मनीषियों ने जीवन लक्ष्य की पूर्ति के महान विज्ञान का आविष्कार करते हुए इस बात पर बहुत जोर दिया था कि व्यक्ति का लौकिक जीवन पूर्ण रीति से सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत हो। आत्म कल्याण का मार्ग यही आरम्भ होता है। यदि मनुष्य अपने सामान्य जीवन क्रम को सन्तोषजनक रीति से चला न सका तो आध्यात्मिक जीवन में भी, परलोक में भी उसको सफलता अनिश्चित ही रहेगी।

🔶 इस तथ्य को दृष्टि में रखते हुए चार आश्रम की क्रमबद्ध व्यवस्था की गई थी। आरंभिक जीवन में शक्ति संचय, मध्य जीवन में कुटुम्ब और समाज की प्रयोगशाला में अपने गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार, ढलते जीवन में लोकहित के लिए परमार्थ की तैयारी और अन्त में जब सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं महानता विकसित हो जाय तो उसका लाभ समस्त संसार को देने के लिए विश्व आत्म परम आत्मा, समष्टि जगत् को आत्म समर्पण करना। यही ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की प्रक्रिया है।

🔷 लौकिक जीवन में अपनी प्रतिभा का परिचय दिये बिना ही लोग पारलौकिक जीवन की कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहते है। यह तो स्कूल का बहिष्कार करके सीधे एम. ए. की उत्तीर्ण का आग्रह करने जैसी बात हुई। इस प्रकार व्यतिक्रम से ही आज लाखों साधु संन्यासी समाज के लिए भार बने हुए है। वे लक्ष्य की प्राप्ति क्या करेंगे, शान्ति और संतोष तक से वंचित रहते है। इधर की असफलता उन्हें उधर भी असफल ही रखती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति,  जून 1961 पृष्ठ 5

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/June/v1.5

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...