रविवार, 2 अप्रैल 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 April

🔴 मृत्यु का भय उन्हें ही भयभीत करता है जिन्होंने मरणोत्तर जीवन के लिये सुखद स्थिति प्राप्त करने की कोई पूर्व तैयारी नहीं की है। अनिश्चित अन्धकार में प्रवेश करना ही भयानकता की आशंका बनकर मनुष्य को डराता है। विशेषतया यह डर तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब अगले दिनों अधिक गहरी विपत्ति सामने प्रस्तुत होने की आशंका रहती हो। जिनने संकीर्ण स्वार्थपरता और अनैतिकता का आशय लेकर जिन्दगी के दिन काटे हैं उनकी अन्तरात्मा को अदृश्य चेतना आगाह करती रहती है कि इन आज की दुष्प्रवृत्तियों का परिणाम कल भयानक विपत्ति के रूप में ही सामने आ रहा है। यह आगाही ही मृत्यु भय को सघन बनाती है और मरने का नाम सुनते ही कंपकंपी आती है।

🔵 मृत्यु के उपरान्त जीव के कर्मों का लेखा-जोखा परमेश्वर के सामने होता है और न्याय-तुला पर तौलकर दण्ड पुरस्कार का विधान बनता है। अपराधी मनःस्थिति यह जानती है सर्वांतर्यामी न्यायाधीश से कुछ छिपा नहीं है वह कर्म और उसके उद्देश्य को भली प्रकार जानता है और बिना किसी पक्षपात अथवा दया-निर्दयता का आशय लिये परिणाम भुगतने के लिए प्राणी को बाध्य करता है।

🔴 जिन्होंने सत्कर्म किये हैं और जीवन की विभूतियों का सदुपयोग किया है उन्हें निश्चिंतता रहती है कि अपना भविष्य उज्ज्वल है। ऊँचे पद पर स्थानान्तर होने वाले कर्मचारी खिन्न नहीं प्रसन्न होते हैं वे जानते हैं कि जहाँ जा रहे हैं वहाँ अधिक सम्मान और सुविधा साधन मिलेंगे। ऐसे लोग पुराना स्थान छोड़ते हुए दुखी नहीं प्रसन्न होते हैं। दुख होता भी है तो वह विदाई बिछोह जैसा क्षणिक होता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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