बुधवार, 1 अगस्त 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 17)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत

🔷 जिन व्यक्तियों ने युग परिवर्तन के सरंजाम को संभव कर दिखाया है, उनके क्रियाकलापों पर एक दृष्टि डालकर यह भली-भाँति जाना जा सकता है कि जब भी प्रतिभा का सुनियोजन सही दिशा में होता है, उस व्यक्ति का ही नहीं, वातावरण का भी कायाकल्प हो जाता है। महाप्रतापी राणा प्रताप व शिवाजी से लेकर सुभाषचंद्र बोस, मनस्वी गाँधी इन्हीं कुछ शताब्दियों में जन्मे महामानव हैं, जिन्होंने प्रतिभा के सुव्यवस्थित सुनियोजन से असंभव को संभव कर दिखाया। वस्तुतः महामानवों का जीवन अपने आप में एक प्रयोगशाला है। उनके उदाहरणों से बहुत कुछ सीखा और पाया जा सकता है।
  
🔶 प्रतिभा परिवर्धन का प्रशिक्षण करने वाले कोई स्कूल, कॉलेज कहीं नहीं हैं। उसके लिए निर्धारित सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने के लिए अवसर और वातावरण स्वयं तलाशना पड़ता है। उस प्रकार के अवसर और वातावरण कहीं एक जगह एकत्रित नहीं मिलते। उन्हें दाने बीनने वाले की तरह झोली में भरना पड़ता है। पर इन दिनों एक ऐसा सुयोग सामने है, जिसके साथ संबंध सूत्र जोड़ने पर हर किसी को वह सुयोग हस्तगत हो सकता है।

🔷 जिसके सहारे प्रतिभा संपादन का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो सके, ऐसे सुयोग कभी-कभी ही सामने आते हैं और उन्हें कोई बिरले ही पहचानकर लाभ उठा पाते हैं। हनुमान् ने समय को पहचाना और वे थोड़े ही समय में समुद्र लाँघने, पर्वत उखाड़ने और लंका को मटियामेट करने का श्रेय प्राप्त कर सके। इसे समय की पहचान ही कहना चाहिए। यदि उस सुयोग का लाभ उठाना उनसे न बन पड़ता तो सुग्रीव के सेवक रहकर ही उन्हें दिन गुजारने पड़ते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 21

👉 माँसाहार का पाप पूर्व को भी पश्चिम न बना दे। (भाग 4)

🔶 गाँवों में रहने वाले लोगों को प्रायः लकड़बग्घे, बाघ या भेड़ियों का सामना करना पड़ जाता है। शहरी लोग चिड़िया−घरों में इन जन्तुओं को दे...