गुरुवार, 5 जुलाई 2018

👉 दोषों में भी गुण ढूँढ़ निकालिये (भाग 1)

🔷 संसार की प्रत्येक वस्तु गुण-दोष-मय है। न तो कोई ऐसा पदार्थ है जिससे किसी प्रकार का दोष न हो और कोई चीज ऐसी जिसमें केवल दोष ही दोष भरे हों। मनुष्य के भीतर स्वयं दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की वृत्तियाँ काम करती हैं। परिस्थिति के अनुसार उनमें से कभी कोई दबती है तो कभी उभरती है। जिससे एक मनुष्य जो एक समय से बुरा प्रतीत होता था दूसरे समय में अच्छा लगने लगता है।

🔶 हर वस्तु के बुरे और भले दोनों ही पहलू हैं। उन्हें हम अपनी दृष्टि के अनुसार देखते और अनुभव करते हैं। हंस के सामने पानी और दूध मिला कर रखा जाए तो केवल दूध ही ग्रहण करेगा और पानी छोड़ देगा। फूलों में शक्कर होती तो है पर उसकी मात्रा बहुत स्वल्प है, हम लोग किसी फूल को तोड़ कर चखें तो उसमें जरा सी मिठास प्रतीत होती है पर शहद की मक्खी को देखिए वह फूलों में से केवल मिठास ही चूसती है शेष अन्य स्वादों का जो बहुत सा पदार्थ फूल में भरा पड़ा है, उसे व्यर्थ समझ कर छोड़ देती है।

🔷 स्वाति की बूँद एक ही प्रकार की होती है पर उससे अलग-अलग जीव अपनी आंतरिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग प्रकार के लाभ उठाते हैं। साँप के मुख में जाकर स्वाति बूँद हलाहल विष बन जाती है, सीप के मुख में पड़ने से वह मूल्यवान मोती बनती है, बाँस के छेदों में जाने से वंशलोचन उपजता है और पपीहे के मुख में जाने से उसकी प्यास-मात्र लुप्त होती है। वस्तु एक ही थी पर अलग-अलग जीवों ने उसका उपयोग अपने-अपने ढंग से किया और उसका लाभ भी अलग-अलग उठाया। एक वैद्य पारद् को लेकर बहुमूल्य रसायन बनाता है जिससे अनेक व्यक्ति स्वास्थ्य लाभ करते हैं। दूसरी ओर उसी पारद को खाकर दूसरा आदमी प्राणघात कर लेता है। चाकू से एक विद्यार्थी कमल बनाता है, कागज काटता है, दूसरा ना समझ बालक उससे अपनी उंगली काट लेता है। बिजली से एक व्यक्ति बत्ती जलाने, पंखा चलाने और रेडियो बजाने का काम लेता है दूसरा उसी का गलत उपयोग करके अपने लिए संकट उत्पन्न कर लेता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1960 पृष्ठ 3