शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 2 Oct 2016

हर मनुष्य की अपनी एक तौल होती है। इसे आत्म-श्रद्धा कहें या आत्म-गौरव। हर व्यक्ति इसी आंतरिक तौल के आधार पर आचरण करता है, उसी के अनुरूप ही उसे दूसरों से प्रतिष्ठा भी मिलती है और सांसारिक सुखोपभोग भी मिलते हैं। अपने आपके प्रति जिसमें जितनी प्रगाढ़ श्रद्धा होती है वह उतने ही अंश में नेक, ईमानदार, सच्चरित्र, तेजस्वी और प्रतापी होता है। इन सद्गुणों का बाहुल्य ही विपुल  सफलता के रूप में परिलक्षित होता है।

सच्चा भक्त साहसी और शूरवीर होता है। वह प्रलोभनों एवं भय के आगे झुकता नहीं। जो उचित है, जो सत्य है, उसी का समर्थन करता है, उसी पर दृढ़ बना रहता है और उसी को अपनाने में दुनियादारों की सम्मति की परवाह न करते हुए जो विवेक सम्मत है उसी पर अड़ा रहता है। सत्प्रवृत्तियों को अभ्यास में लाते समय अपनी बुरी आदतेां से जो संघर्ष करना पड़ता है, उसे वीर योद्धा की तरह करता है। अभावग्रस्त और कष्टप्रद जीवन जीकर भी वह आदर्शवादिता की रक्षा करता है इसलिए वह तपस्वी कहलाता है।

श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाये गये मार्ग को दिखाता रहता है। जब कभी मनुष्य एक क्षण के लिए  भी लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठंडे जल से मुँह धोकर जगा देने वाली शक्ति यह श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्य स्वरूप एवं ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती। जबउसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है, उसी को श्रद्धा कहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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