सोमवार, 30 जुलाई 2018

👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 15)

👉 प्रतिभा परिवर्धन के तथ्य और सिद्धांत

🔷 प्रतिभाएँ एकाकी बढ़कर अपने अग्रगमन की क्षमता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। फिर सर्वत्र उनकी मनस्विता का लोहा माना जाने लगता है। दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करते हैं, जिनकी जिम्मेदारियाँ भारी हैं, वे ऐसे ही लोगों को तलाश करते रहते हैं। प्रामाणिकता की परख होने पर सब ओर से एक-से-बढ़कर एक भारी-भरकम जिम्मेदारियाँ उनके ऊपर आग्रहपूर्वक डाली जाने लगती हैं। वे उन्हें स्वीकार करते और जो कार्य लिया गया है, उसे सर्वांगपूर्ण ढंग से संपन्न कर दिखाते हैं।
  
🔶 रेल का इंजन एकाकी चलता है। स्वयं दौड़ता है और अपने साथ भरे डिब्बों की लंबी शृंखला को घसीटते हुए निर्धारित लक्ष्य की दिशा में पटरी पर दौड़ता चला जाता है। सर्वविदित है कि डिब्बों की तुलना में इंजन को अधिक महत्त्व मिलता है। अधिक मूल्यांकन भी होता है। यह और कुछ नहीं साहस भरी व्यवस्था का परिचय देने वाली ऊर्जा की ही परिणति है। प्रतिभाओं में यह सद्गुण उनके द्वारा स्वउपार्जित स्तर का, बड़ी मात्रा में पाया जाता है। वे औरों का मुँह ताकते हुए नहीं बैठे रहते, वरन आगे बढ़कर औरों को अपने चुंबकत्व के कारण जोड़ते और साथ चलने के लिए बाधित करते हैं। सफलताओं का यही स्रोत है।
  
🔷 यों प्रतिभा का दुरुपयोग भी हो सकता है। धन का, बल का, सौंदर्य का, कौशल का, नियोजन यदि भ्रष्ट-चिंतन और दुष्ट आचरण में किया जाए तो वैसा भी हो सकता है। आतंकवादी, अनाचारी, उच्छृंखल, उद्धत लोग प्राय: वैसा करते भी हैं। इतने पर भी यह निश्चित है कि कोई इस आधार पर न तो स्थिर प्रगति कर सकता है और न ही कोई ऐसी परंपरा पीछे छोड़ सकता है, जिसे सराहा जा सके। आज नहीं तो कल-परसों ऐसे लोग आत्मप्रताड़ना, लोकभर्त्सना से लेकर राजदंड और दैवी प्रकोप के भाजन बनते ही हैं। लानत और घृणा तो भीतर-बाहर से उन पर निरंतर बरसती ही रहती है। 

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 19

👉 सुखी कैसे हो

🔶 “स्वार्थी और धनी आदमियों की समझ में न आने वाली एक सबसे रहस्यमयी गुत्थी यह है कि जहाँ उन्होंने सुख पाने की आशा की थी, वहाँ उन्हें सुख ...