बुधवार, 27 जून 2018

👉 क्रोध हमारा आन्तरिक शत्रु है (भाग 4)

🔷 चिड़चिड़ाहट प्रायः वृद्धों में अधिक देखने में आती है। रोगी अपनी दुर्बलता के कारण जरा-2 सी बात पर तिनक उठते हैं, औरतें काम से परेशान होकर इतनी उद्विग्न रहती हैं कि मामूली सी बात पर चिड़चिड़ा जातीं हैं। अध्यापक विद्यार्थियों की काँव-कांव सुनते-2 इतने दुःखी से हो उठते हैं कि तिनक उठते हैं। दुकानदार प्रायः ग्राहकों से जलभुन कर इस मानसिक दुर्बलता के शिकार बनते हैं। धार्मिक वृत्ति वाले रूढ़िवादी दुनिया की प्रगति देख-देखकर जीवन भर बड़बड़ाया करते हैं।

🔶 क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई स्थिति में रख देता है जिसके परिणामस्वरूप मन दूषित विकारों से भर जाता है। क्रोध से प्रथम तो उद्वेग उत्पन्न होता है। मन एक गुप्त किन्तु तीव्र पीड़ा से दुग्ध होने लगता है। रक्त में गमफल आ जाती है, और उसका प्रवाह बड़ा तेज हो जाता है। इस गमफल में मनुष्य के शुभ भाव, दया, प्रेम, सत्य, न्याय, विवेक, बुद्धि जल जाते हैं।

🔷 जिस पर क्रोध किया गया है यदि वह क्षमावान् और शान्त प्रकृति का हो और क्रोध से विचलित न हो, तो क्रोध करने वाले को बहुत दुःख होता है। वह जलभुन कर राख हो जाता है। मन में एक प्रकार का तूफान सा उठता है जिसका वेग इतना प्रबल होता है कि मनुष्य अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाता। विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है, शिष्टता एवं शान्ति से वह हाथ धो बैठता है। कई बार क्रोध से उत्तेजित होकर क्रोधी व्यक्ति दूसरे की हिंसा और आत्मघात तक कर बैठते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1950 पृष्ठ 17
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/May/v1.17