सोमवार, 22 जनवरी 2018

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 4)

🔷 प्राचीनकाल में ऋषि अपने आश्रम में लोगों को बुलाते थे और सत्संग की प्रेरणा देते थे, शिक्षा की प्रेरणा देते थे। सत्संग और शिक्षा की प्रेरणा के पश्चात् यही किया करते थे कि उनके शिष्यों की शिक्षा को परिष्कृत और परिपक्व किया जाय। व्यायामशाला में सिखाने के पश्चात् लोगों को अखाड़े में भेज दिया जाता है। अखाड़े में से निकलने के पश्चात् दंगल में भेज दिया जाता है। दंगल में कोई आदमी जाये ही नहीं, तो उसको मैं क्या कहूँगा? मिलिट्री का प्रशिक्षण किस तरह का होता है, आप जानते हैं क्या? मिलिट्री का प्रशिक्षण किसी आदमी को दिया जाय और वह यह कहे कि हम तो यहीं पर, इसी स्थान पर रहेंगे और दिन भर मिलिट्री की ट्रेनिंग दिया करेंगे। क्योंकि हमको छावनी में भर्ती किया गया है, इसलिए हम छावनी में ही निवास करेंगे। हम लड़ाई पर नहीं जायेंगे। छावनी में रहना आपको कैसे मंजूर होगा। आप छावनी में क्यों रहेंगे। छावनी में हमने आपको इसलिए रखा था और बंदूक चलाना आपको इसलिए सिखाया था कि लड़ाई के मोर्चे पर जब आवश्यकता होगी, तो आप लड़ाई के मोर्चे पर चले जायेंगे और लड़ना शुरू कर देंगे। लड़ाई के मोर्चे पर जाने के लिए हमको छावनी छोड़नी पड़ती है और बंदूक चलाना सिखाना पड़ता है।

🔶 मित्रो! स्थान विशेष पर जिनको हम संतों के आश्रम कहते हैं, जिनको हम गुरुकुल कहते हैं, जिनको हम सत्संग भवन कहते हैं, जिनको हम साधना भवन कहते हैं। उन स्थानों पर जाने और रहने की आवश्यकता केवल इसलिए है कि हम वहाँ से प्रेरणा लें और प्रकाश वितरित करें। वहाँ से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करने के पश्चात् सारे समाज में चले जायें और वहाँ ज्ञान का प्रकाश फैलाएँ। मित्रो! हमें आपके लिए उसी प्राचीनकाल की परम्परा की पुनः स्थापना करनी पड़ रही है, उसे पुनः जाग्रत करना पड़ रहा है। हम ऐसे स्थान और आश्रम बनाने में यकीन नहीं करते, जहाँ आदमी को घर छोड़ करके बुला लिया जाय और वानप्रस्थाश्रम बना दिया जाय, सत्संग आश्रम बना दिया जाय और लोगों से यह कहा जाय कि अब आप जिंदगी भर यहीं रहिए। क्यों साहब! जिंदगी भर रह करके आप यहाँ क्या करेंगे? ज्ञान सीखेंगे। तो ज्ञान का क्या करेंगे? ज्ञान को कर्मयोग में परिणत कीजिए। ज्ञानयोग की सार्थकता इसी में है। ज्ञान अगर कर्मयोग में परिणत नहीं किया जाता है तो ज्ञान निरर्थक है। उस ज्ञान के परिणत नहीं किया जाता तो ज्ञान निरर्थक है। उस ज्ञान का कोई मतलब नहीं रह जाता।

🔷 साथियो! हमने आपको जो थोड़े समय तक शिक्षण दिया है, उस शिक्षण को आपको कर्तव्य रूप में परिणत करना चाहिए और क्रियारूप में परिणत करना चाहिए। अब आप यहाँ से विदा हो रहे हैं। जब भी हमको आवश्यकता होगी हम आपको दुबारा बुला लेंगे। इस समय हम जो आपको विदा कर रहे हैं, उसका एक ही उद्देश्य है—पीड़ा और पतन का निवारण। इसने समूची मानव जाति को तबाह कर डाला है। इसने सारे-के संसार को मूर्ख बना दिया, अंधकार में डुबो दिया है। इसे हमें मिटाना है। इस अंधकार और दर्द को, दुःख और पाप को मिटाना है। इसने भगवान के वरिष्ठ राजकुमार मानव जाति को पशुओं से भी गया-बीता, पापियों से भी गया बीता बना दिया है। अब करना यह पड़ेगा कि हम आपको वहाँ भेजेंगे जहाँ भूकम्प आया हुआ है। जहाँ बाढ़ आयी हुई है। जहाँ पतन छाया हुआ है। मैंने आपको हजार बार कहा है और लाख बार फिर कहूँगा कि मनुष्य के सामने जो गुत्थियाँ दिखाई पड़ती हैं, जो कुछ भी अशांति दिखाई पड़ती है, जो कुछ भी अभाव दिखाई पड़ता है और जो भी कुछ दुःख दिखाई पड़ता है, उसका और कोई कारण नहीं है। उसका एक ही कारण है कि मनुष्य अपनी विचारधारा को विकृत बना चुका है। विकृत विचार धारायें ही पतन का मुख्य कारण हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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