सोमवार, 22 जनवरी 2018

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 Jan 2018

🔶 अधिकांश मनुष्यों की मानसिक बनावट ऐसी होती है कि वे अपने आपको हर बात में निर्दोष मानते हैं। अपनी बुराइयां उसी प्रकार सूझ नहीं पड़ती जिस प्रकार अपनी आंख में लगा हुआ काजल दिखाई नहीं देता। कोई दूसरा व्यक्ति यदि अपनी गलती सुझावे भी तो मन इस बात के लिए तैयार नहीं होता कि उसे स्वीकार करे। हर आदमी दूसरे के दोष ढूंढ़ने में बड़ा चतुर और सूक्ष्मदर्शी होता है, उसकी आलोचना शक्ति देखते ही बनती है, पर जब अपना नम्बर आता है तो वह सारी चतुरता, सारी आलोचना शक्ति न जाने कहां गायब हो जाती है। जैसे खोटा व्यापारी खरीदने और बेचने के बांट तोल में घटे बढ़े बना कर अलग-अलग रखता है और बेचने के समय घटे बांटो को और खरीदने के समय बढ़े बांटो को काम में लाता है, उसी प्रकार दूसरों की बुराइयां ढूंढ़ने में हमारी दृष्टि अलग तरीके से और अपनी बात आने पर और तरीके से काम करती है। यदि यह दोष हटा दिया जाय और दूसरों की भांति अपनी बुराई भी देखने लग जायें, दूसरों को सुधारने की भी चिन्ता करने की भांति यदि अपने सुधारने की भी चिन्ता करने लगें तो इतना बड़ा काम हो सकता है जितना सारी दुनिया को सुधार लेने पर ही हो सकना संभव है।

🔷 जीवन लक्ष की पूर्ति के लिये भी सबसे प्रथम अनिवार्य रूप से आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार ही करना पड़ता है। भगवान का नाम स्मरण करने, जप-तप, पूजा-पाठ के अनुष्ठान करने का उद्देश्य भी यही है कि मनुष्य भगवान को सर्वव्यापी एवं न्यायकारी होने की मान्यता को अधिक गहराई तक हृदय में जमा ले ताकि दुष्कर्मों से डरे और सत्कर्मों में रुचि ले। ईश्वर उसी से प्रसन्न होता है जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसकी पूजा एवं प्रार्थना को वह सुनता और स्वीकार करता है। आत्मा पर चढ़े हुए मल आवरणों को हटाने के प्रयत्न का नाम ही तप साधना है उसे निर्मल निर्विकार बनाने में जितनी सफलता मिलती जाती है उतना ही देवत्व अन्दर बढ़ता जाता है और परमात्मा की समीपता निकट आती जाती है। विकारों से पूर्ण निर्मल हो जाने पर ही आत्मा जीवन-मुक्त होकर परमात्मा स्वरूप बन जाता है। आत्मोन्नति की यही एक मात्र प्रक्रिया है जिसे विभिन्न धर्म शास्त्रों ने, विभिन्न मार्ग दर्शकों ने देश काल के अनुसार विभिन्न रूपों में उपस्थित किया है।

🔶 अपने आपको सुधारने का प्रयत्न करना, अपने दृष्टिकोण में गहराई तक समाई हुई भ्रान्तियों का निराकरण करना मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। हमें यह करना ही चाहिए। वरन् सबसे पहले सबसे अधिक इसी पर ध्यान देना चाहिए। अपना सुधार करके न केवल हम अपनी सुख-शान्ति को चिरस्थायी बनाते हैं वरन् एक प्रकाश स्तम्भ बन कर दूसरों के लिये भी अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करते हैं। इस प्रयत्न को किसी भी बड़े पुण्य परमार्थ से, किसी भी जप-तप से कम महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।  

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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