शनिवार, 8 जुलाई 2023

👉 सहयोग और सहिष्णुता (भाग 3)

विवाह के समय देवता और पंचों को साक्षी देकर लोग यह धर्म प्रतिज्ञा करते हैं कि हम इस नारी के जीवन का सारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेते हैं। जैसे बालक का सारा उत्तरदायित्व उसकी माता पर होता है, माता अपने बच्चे से काम लेती है, डाँटती-फटकारती भी हैं परन्तु उससे भी पहले उसके हृदय में अनन्त करुणा, आत्मीयता, ममता और क्षमा का समुद्र लहराता होता है। जिस माता के हृदय में वात्सल्य, क्षमा, ममता और करुणा की भावना न हो केवल बच्चे से अपना फायदा उठाने की, उसे गुलाम की तरह वशवर्ती रखने की वृत्ति हो वह माता शब्द को अलंकित ही करेगी। इसी प्रकार जो लोग देवताओं और मन्त्रों की साक्षी में अपनी धर्मपत्नी को माता, पिता, भाई बहिन सबसे छुड़ाकर उनके स्नेह एवं उत्तरदायित्वों की पूर्ति अपने ऊपर लेते हैं उन्हें उचित है कि जीवन भर उस विवाह की प्रतिज्ञा को निबाहें, परन्तु देखा जाता है कि स्त्री को थोड़ी सी नासमझी का उसे इतना भारी दण्ड दिया जाता है जिसे देखकर न्याय की आत्मा भी काँप जाती है। पतियों द्वारा पत्नी की हत्या या परित्याग में प्रायः ऐसा ही कायर विश्वासघात भरा होता है।

वासना और धन का लोभी मनुष्य न्याय मार्ग से जब अपनी लोलुपता को पूरा नहीं कर पाता तो अनेक अनैतिक, छल पूर्ण मार्ग अपना कर अपना स्वार्थ साधन करता है। गायत्री माता इस कुमार्ग पर चलने से अपने प्रिय पुत्रों को रोकती है। ‘गो’ अक्षर का संदेश है कि हम विश्वासघाती न बनें। अपने धर्म, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को निबाहें। सचाई के मार्ग पर चलने से यदि कुछ असुविधाएं भी सहनी पड़ें तो उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सहना चाहिए। इस प्रकार जो सत्य के मार्ग पर चलने में असुविधाओं का स्वागत करने को भी तैयार रहते हैं वे ही गायत्री माता के सच्चे प्रेम पात्र बन सकते हैं।

‘गो’ शब्द के अंतर्गत गायत्री माता की दूसरी शिक्षा यह है कि—हम सहिष्णु बनें। किसी की जरा सी गलती पर आग बबूला हो जाना या किसी से थोड़ा सा मतभेद होने पर उसे जानी दुश्मन मान लेना बहुत संकुचित विचार है। संसार में कोई भी पूर्णतया निर्दोष, या निष्पाप नहीं है, हर मनुष्य अपूर्ण है उसमें कुछ न कुछ दोष बुराई या कमी अवश्य रहती है। थोड़ी सी कमी के लिए उसे पूर्ण त्याज्य समझ लेना ठीक नहीं। दूसरों ही अच्छाइयों का समुचित उपयोग करना चाहिए, उन्हें बढ़ाना चाहिए, त्रुटियों को सुधारने या घटाने का प्रयत्न करना चाहिए, परन्तु इसके लिए अधीर नहीं होना चाहिए। सहिष्णुता और धैर्यपूर्वक कामचलाऊ सहयोग का मार्ग निकाल लेना चाहिए और आततायी रीति से नहीं वरन् मधुर, सुव्यवस्थित एवं न्यायोचित मार्ग से प्रतिकूलता को अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसम्बर 1952 पृष्ठ 3


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