सोमवार, 17 जुलाई 2017

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 3)

🔵 भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ है। गोल क्या है—ग्लोब। यह सारा विश्व ही तो भगवान् है। अगर विश्व को इस रूप में मानें तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जाएँगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था। गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डुबा हुआ था, तब भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा—यह सारा विश्व-ब्रह्माण्ड जो कुछ भी है, मेरा ही रूप है। एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रही थी कि तैने मिट्टी खाई है। वे बोले—नहीं, मैंने मिट्टी नहीं खाई और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व-ब्रह्माण्ड दिखाया और कहा—यह मेरा असली रूप है।

🔴 भगवान राम ने भी यही कहा था। रामायण में वर्णन आता है कि माता-कौशल्या और काकभुशुण्डि जी को उन्होंने अपना विराट् रूप दिखाया था। इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति, भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए। शंकर की गोल पिंडी उसी का छोटा-सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व-ब्रह्माण्ड गोल है, एटम गोल है, धरती माता-विश्वमाता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से, तो मजा आ जाए। फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाए जो शंकर भक्तों की होनी चाहिए।

🔵 भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है? शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है। गंगा का मतलब है—ज्ञान की गंगा। पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता, यदि होगा तो आदमी डूब जाएगा, पैदल नहीं चल सकेगा। इसका मतलब यह है कि शंकर-भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए, उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। घटिया किस्म के आदमी जिस तरीके से विचार करते हैं, जिनकी जिंदगी का मकसद केवल एक ही है कि किसी तरीके से पेट भरना चाहिए और औलाद पैदा करनी चाहिए, शंकर जी के भक्त को उस तरह के विचार करने वाला नहीं होना चाहिए।

🔴 जो कोई ऊँची बात सोच नहीं सकते, देश की, समाज की, धर्म की, लोक-परलोक की बात, कर्तव्य-फर्ज की बात जिनकी समझ में नहीं आती, उनको इनसान नहीं हैवान कहेंगे और ज्ञान की गंगा जिन लोगों के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती है, उनका नाम शंकर का भक्त होता है। हमारे और आपके मस्तिष्क में से भी ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए, जो हमारी आत्मा को शांति और शीतलता दे सकती है और पड़ोस के लोगों को, समीपवर्ती लोगों को उसमें स्नान कराकर पवित्र बना सकती है। यदि हमारा मस्तिष्क ऐसा व्यवहार करता हो तो जानना चाहिए कि शंकर जी की छवि आपने घरों में टाँग रखी है, उसके मतलब को, उसकी फिलॉसफी को जान लिया और समझ लिया है।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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