शनिवार, 15 जुलाई 2017

👉 भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन (भाग 2)

🔵 अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने संस्कृत से हिन्दी में किया है। उसमें से शिवपुराण की एक कथा मुझे याद आई, जिसने हमारी शंका का समाधान कर दिया कि भगवान शंकर सहायता क्यों नहीं करते हमारी? क्यों नहीं उनकी शक्ति का लाभ मिलता? क्यों उनके चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते? जबकि शंकर भगवान के भक्त जिन्होंने क्या से क्या अनुदान प्राप्त किए हैं, जो भी तप करने के लिए खड़ा हो गया वह न जाने क्या से क्या प्राप्त करता चला गया?

🔴 हम और आप जैसे शिव-उपासक उस शक्ति को प्राप्त न कर सकते हों सो ऐसी बात नहीं, पर कहीं न नहीं चूक रह जाती है, कहीं न कहीं भूल रह जाती है। उस भूल को हमें निकालना ही पड़ेगा और निकालना ही चाहिए। इसके बिना अध्यात्म का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा और दुनिया के सामने हम सिर ऊँचा उठा कर यह नहीं कह सकेंगे कि हम ऐसी शक्ति के उपासक हैं जो अपनी उँगली के इशारे से सारी दुनिया को हिला सकती है तो गलती और चूक कहाँ हो गई? चूक और गलती वहाँ हो गई जहाँ भगवान शिव और पार्वती का असली स्वरूप हमको समझ में नहीं आया। उसके पीछे जो फिलॉसफी है वह समझ में नहीं आई, मात्र उसका बाहरी स्वरूप समझ में आ गया।

🔵 भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण, एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप। जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजिटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिलाकर जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेंट चालू हो जाता है, उसी प्रकार से भगवान का करेंट चालू हो जाएगा। बहिरंग रूप के बारे में आप जानते हैं और जिस तक आप सीमित हो गए हैं, वह कलेवर है जो मंदिर में बैठा हुआ है। जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते हैं, जल चढ़ाते हैं, पूजा करते हैं, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं—वह बहिरंग कलेवर है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है। हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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