मंगलवार, 20 जून 2017

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 5)

🔴 बगुले और हंस सफेद होते हैं दोनों; लेकिन प्रकृति में अंतर होता है। आकृति में क्या फरक होता है! आप दूर से फोटो खींच लीजिए, आकृति में थोड़ा-सा ही फर्क दिखाई पड़ेगा। कौए और कोयल की प्रकृति नहीं मिल सकती। कौए और कोयल की प्रकृति तो एक जैसी ही है। आप फोटो खींच लीजिए, दोनों एक-से ही मालूम पड़ेंगे तो फिर कौआ, कोयल कैसे हो जाता है? यहाँ आकृति बदलने की बात नहीं है, प्रकृति बदलने की ओर इशारा है।

🔵 यह कायाकल्प का वर्णन है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कायाकल्प का वर्णन ऐसे ही रूप में किया है। आपको यहाँ अपना कायाकल्प करने की तैयारी करनी चाहिए। शरीर कल्प नहीं, मनःकल्प। मनःकल्प आप किस तरह करें? इस तरह कीजिए कि आपका क्षुद्रता का दायरा, महानता के दायरे में बदल जाए। आपका दाया बहुत छोटा है। कूपमण्डूक के तरीके से, कुएँ के मेढक के तरीके से पेट भरेंगे, रोटी कमाएँगे, बेटे को खिलाएँगे, बेटी को खिलाएँगे, एक छोटे-से दायरे में गूलर के भुनगे के तरीके से आप भी सारी चीजों को सीमाबद्ध किए हुए हैं। आप असीम बन जाइए। आप महान बन जाइए। आप सीमित रहने से इनकार कर दीजिए।

🔴 आप पिंजड़े के पक्षी की तरह जिंदगी मत व्यतीत कीजिए और आप उड़ने की तैयारी कीजिए। कितना बड़ा आकाश है, इसमें स्वच्छन्द विचरण करने के लिए उमंगें एकत्रित कीजिए और पिंजड़े की कारा में कैद होने से इनकार कर दीजिए। आपको मालूम पड़ता है कि पिंजड़े की कीलियों में हम सुरक्षित हैं, यहाँ हमको चारा, दाना मिल जाता है; लेकिन कभी आपने खुली हवा में साँस ली नहीं है और आपने अपने पंखों के साथ उड़ाने का, आसमान में आनंद लिया नहीं है। आप ऐसा कीजिए, आप यहाँ से अपने आपको बंधन-मुक्त करने की कोशिश कीजिए। आप भव-बंधनों में जकड़े हुए आदमी मत रहिए। आप मुक्त आदमी की तरह विचार कीजिए। आप नर से नारायण बनने की महत्त्वाकांक्षा तैयार कीजिए।

🔵 आप उसी क्षुद्र महत्त्वाकांक्षा में उलझे रहेंगे क्या? कौन-सी? लोकेषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा। नहीं, आप कुछ और बड़ी महत्त्वाकांक्षा को लाइए। आप पुरुष से पुरुषोत्तम बनिए, आप नर से नारायण बनने की बात विचार कीजिए, आप कामनाओं की आग में जलने की अपेक्षा भावनाओं के स्वर्ग और शांति में प्रवेश कीजिए। कामनाओं में ही लगे रहेंगे क्या? आप माँगते ही रहेंगे क्या? भिखारी ही बने रहेंगे क्या? नहीं, आप भिखारी बनने से इनकार कर दीजिए। अब आप यहाँ से दानी बनकर जाइए। जिंदगी भर आपने अपेक्षाएँ की हैं, इसकी अपेक्षा उसकी अपेक्षा; गणेश जी हमको ये दे देंगे, साँई बाबा ये दे देंगे, औरत हमको यह देगी, बच्चा हमको यह कमाकर देगा; आपका सारा जीवन भिखमंगे की तरह, अपेक्षा करने वालों की तरह व्यतीत हो गया। अब आप कृपा कीजिए और अपना ढर्रा बदल दीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

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