मंगलवार, 20 जून 2017

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 3)

🔴 पत्नी के रूप में उसका महत्व कुछ कम नहीं हैं नारी पुरुष की अर्धांगिनी हैं पत्नी के बिना पति का व्यक्तित्व पूरा नहीं होता। उसी की महिमा के कारण पुरुष गृहस्थ होने का गौरव पाता है और पत्नी ही वह माध्यम है जिसके द्वारा किसी की वंश परम्परा चलती है। यह पत्नी की ही तो उदारता है कि वह पुरुष के पशुत्व को पुत्र में बदल कर उसका सहारा निर्मित कर देती है। पुरुष के प्यार, स्नेह तथा उन्मुक्त आवेगों को अभिव्यक्त करने में पत्नी का कितना हाथ है इसे सभी जानते है।

🔵 परेशानी, निराशा, आपत्ति अथवा जीवन के निविड़ अंधकार में वह पत्नी के सिवाय कौन है जो अपनी मुस्कानों से उजाला कर दिया करे अपने प्यार तथा स्नेह से हृदय नवजीवन जगाकर आश्वासन प्रदान करती रहे। पत्नी का सहयोग पुरुष के सुख में चार चाँद लगा देता और दुःख में वह उसकी साझीदार बनकर हाथ बँटाया करती हैं दिन भर बाहर काम करके और तरह-तरह के संघर्षों से थककर आने पर भोजन स्नान तथा आराम-विश्राम की व्यवस्था पत्नी के सिवाय और कौन करेगा।

🔴 पुरुष एक उद्योगी उच्छृंखल इकाई है। परिवार बसाकर रहना उसका सहज स्वभाव नहीं हैं यह नारी की ही कोमल कुशलता है जो इसे पारिवारिक बनाकर प्रसन्नता की परिधि में परिभ्रमण करने के लिये लालायित बनाये रखती है। पत्नी ही पुरुष को उद्योग उपलब्धियों की व्यवस्था एवं उपयोगिता प्रदान करती हैं पुरुष पत्नी के कारण ही गृहस्थ तथा प्रसन्न चेता बनकर सामाजिक भद्र जीवन बिताया करता पत्नी रहित पुरुष का समाज में अपेक्षाकृत कम आदर होता है।

🔵 परिवारों में सामाजिकता के आदान-प्रदान उन्हीं के बीच होता हैं पारिवारिकता तथा पत्नी की परिधि पुरुष को अनेक प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों से बचाये रहती है। पत्नी के रूप में नारी का यह महत्व कुछ कम नहीं है। यदि आज संसार में नारी का सर्वथा अभाव हो जाये तो कल से ही पुरुष पशु हो उठे, सारी समाज व्यवस्था उच्छृंखल हो उठे, और सृष्टि का व्यवस्थित स्वरूप अस्त-व्यस्त हो जाये।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.25

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