शुक्रवार, 16 जून 2017

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 2)

🔴 आप अपने भविष्य को ऐसा मत बनाइए। भविष्य को आप ऐसा बनाइए कि जब तक रहें, तब तक संतोष करते रहें और जब नहीं रहें, तब आपके पद-चिह्नों पर चलकर दूसरे आदमी भी रास्ता तलाश कर सकें। गाँधीजी ने राजकोट में राजा हरिश्चंद्र का ड्रामा देखा और ड्रामा देखकर उस छोटे बच्चे गाँधी के मन पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने उसी दिन यह फैसला कर लिया कि अगर जिऊँगा तो हरिश्चंद्र होकर जिऊँगा। उज्ज्वल भविष्य और उज्ज्वल भविष्य के संकल्प ऐसे ही तो होते हैं, जैसे गाँधीजी के उज्ज्वल भविष्य के सपने थे। संकल्पों से उन्होंने क्या-से कर डाला? आपको ऐसे संकल्पों को चरितार्थ करने के लिए, उज्ज्वल भविष्य को बनाने के लिए यहाँ पूरा सहारा भी है।

🔵 आप कैसे सौभाग्यशाली हैं? आपको तो सहारा भी मिल गया। आमतौर से लोग अकेले ही मंजिल पार करते हैं, अकेले ही चलते हैं; पर आपको तो अकेले चलने के साथ लाठी का सहारा भी है, आप उस सहारे का क्यों नहीं लाभ उठाते? आप लोग पैदल सफर करते हैं, आपके लिए तो यहाँ सवारी भी तैयार खड़ी है, फिर आप लाभ क्यों नहीं उठाते? शान्तिकुञ्ज के वातावरण को केवल यह आप मत मानिये कि यहाँ दीवारें ही खड़ी हुईं हैं, आप यह मत सोचिये कि यहाँ शिक्षण का कुछ क्रम ही चलता रहता है, यह मत सोचिये कि यहाँ कुछ व्यक्ति विशेष ही रहते हैं।

🔴 आप यह भी मानकर चलिये कि यहाँ एक ऐसा वातावरण आपके पीछे-पीछे लगा हुआ है, जो आपकी बेहद सहायता कर सकता है। उस वातावरण से निकली प्राण की कुछ धाराओं को, जिसने खींचकर आपको यहाँ बुलाया है और आप जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, उस वातावरण, प्रेरणा और प्रकाश को चाहें तो आप एक नाम यह भी दे सकते हैं—पारस।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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