मंगलवार, 13 जून 2017

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 2)

🔵 पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठाने की इन दिनों प्रबल माँग है। इस के लिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों को समर्थ बनाने के प्रयत्न चल रहे है। इस औचित्य में एक कड़ी और जुड़नी चाहिए कि हर दृष्टि में हेय स्थिति में पड़ी हुई, दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा जीवन जीने वाली अनेकानेक सामाजिक प्रतिबन्धों में जकड़ी हुई नारी को भी एकता और समा का लाभ मिले। इस ओर से आँखें बन्द किए रहना सम्भवतः प्रगति में चट्टान बनकर अड़ा ही रहेगा।

🔴 अपंग स्तर का व्यक्ति स्वयं कुछ नहीं कर पाता, दूसरों की अनुकम्पा पर जीता है। पर यदि उसकी स्थिति अन्य समर्थों जैसी हो जाय तो किसी के अनुग्रह पर रहने की अपेक्षा वह अपने परिकर को अपनी उपलब्धियों से लाद सकता है। जब लेने वाला देने वाले में बदल जाय तो समझना चाहिए कि खाई पटी और उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी हो गई। आधी जनसंख्या तक स्वतंत्रता का आलोक पहुँचाना और उसे अपने पैरों खड़ा हो सकने योग्य बनाना उस पुरुष वर्ग का विशेष रूप से कर्तव्य बनता है, जिसने पिछले दिनों अपनी अहमन्यता उत्पन्न की। पाप का प्रायश्चित तो करना ही चाहिए। खोदी गई खाई को पाटकर समतल भूमि बननी ही चाहिए ताकि उसका उपयुक्त उपयोग हो सके।

🔵 नारी जागरण आन्दोलन इसी पुण्य प्रयास के लिए उभारा गया है। इसके लिए लैटरपैड, साइनबोर्ड, मजलिस, भाषण, लेखन, उद्घाटन समारोह तो आए दिन होते रहते है पर उस प्रचार प्रक्रिया भर से उतनी गहराई तक नहीं पहुँचा जा सकता जितनी कि इस बड़ी समस्या के समाधान हेतु आवश्यक है। इसके लिए व्यापक जनसंपर्क साधने और प्रचलित मान्यताओं को बदलने की सर्वप्रथम आवश्यकता है। कारण कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक के मन में यह मान्यता गहराई तक जड़ जमा चुकी है कि नारी का स्तर दासी स्तर का ही रहना चाहिए। यही परम्परा है, वही शास्त्र वचन। स्वयं नारी तक ने अपना मानस इसी ढाँचे में ढाल लिया है। चिरकाल तक अन्धेरे में बंद रहने वाले कैदियों की तरह उसके मन में भी प्रकाश के संपर्क में आने का साहस टूट गया है। आवश्यकता प्रस्तुत समूचे वातावरण को बदलने की है। ताकि सुधार प्रक्रिया की लीपा-पोती न करके उसकी जड़ तक पहुँचने और वहाँ अभीष्ट परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सके।

🔴 देखा गया है कि नारी उत्थान के नाम पर प्रौढ़ शिक्षा, कुटीर उद्योग, शिशु पालन, पाकविद्या, गृह व्यवस्था जैसी जानकारियाँ कराने में कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। यों यह सभी बातें भी आवश्यक हैं और किया इन्हें भी जाना चाहिए। पर मूल प्रश्न उस मान्यता को बदलने का है। जिसके आधार पर नारी को पिछड़ेपन में बाँधें रहने वाली व्यापक मान्यता में कारगर परिवर्तन सम्भव हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58

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