मंगलवार, 13 जून 2017

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 11)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार आत्म संयम एवं नियमितता ही हैं। इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर औषधियों का सहारा लाठी की तरह लिया तो जा सकता है, किंतु चलना तो पैरों से ही पड़ता है। शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है, उसे बनाए रखना इन्हीं माध्यमों से संभव है। शरीर को प्रभु मंदिर की तरह ही महत्त्व दें। बचकाने, छिछोरे बनाव शृंगार से उसे दूर रखें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें।

🔴 उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास करें। मौन एवं ब्रह्मचर्य साधना द्वारा जीवनी शक्ति क्षीण न होने दें। उसे अंतर्मुखी होने का अभ्यास करें। श्रमशीलता को दिनचर्या में स्थान मिले। जीवन के महत्त्वपूर्ण क्रमों को नियमितता के शिकंजे में ऐसा कद दिया जाए कि कहीं विशृंखलता न आने पाए। थोड़ी-सी तत्परता बरत कर यह साधा जाना संभव है। ऐसा करके इस शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं, जिनकी संभावना शास्त्रकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने स्वीकार की है।   

🔵 तक बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थीं। उन दिनों की बात है, एक किसान को जमीन की कमी महसूस हुई, अतएव उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। पहाड़ बड़ा घबराया। उसने बीमारियों को आज्ञा दी-बेटियों टूट पड़ो इस किसान पर और इसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालो। बीमारियाँ दंड-बैठक लगाकर आगे बढ़ी और किसान पर चढ़ बैठीं। किसान ने किसी की परवाह नहीं की, डटा रहा अपने काम में। शरीर से पसीने की धार निकली और उसी में लिपटी हुई बीमारियाँ भी बह गईं। पहाड़ ने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया-मेरी बेटी होकर तुमने हमारा इतना काम नहीं किया, अब जहाँ हो वहीं पड़ी रहो। तब से बीमारियाँ परिश्रमी लोगों पर असर नहीं कर पातीं, आलसी लोग ही उनके शिकार होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.17

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