सोमवार, 12 जून 2017

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 10)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।  

🔵 कुछ अपवादों को छोड़कर अस्वस्थता अपना निज का उपार्जन है। भले ही वह अनजाने में, भ्रमवश या दूसरों की देखा-देखी उसे न्यौत बुलाया गया हो। सृष्टि के सभी प्राणी जीवन भर निरोग रहते हैं। मरणकाल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है। मनुष्य की उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है। पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ती है। बिना पचा सड़ता है और सड़न रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है, रोग का लक्षण उभर पड़ता है।

🔴 कामुकता की कुटेब जीवनी शक्ति का बुरी तरह क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का हरण कर लेती है। अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसे कुटेब भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का कारण बनते हैं। खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है। भय का आक्रोश जैसे उतार-चढ़ाव भरे ज्वार-भाटे भी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बनाकर रहते हैं।   

🔵 शरीर को निरोग बनाकर रखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठा कर हर व्यक्ति आरोग्य एवं दीर्घजीवी पा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त, व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण कठिन नहीं है। स्वाद को नहीं स्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनाई जानी संभव है। सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचित विश्राम देकर हर बार तरोताजा बना लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यह सब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुर दुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी हीन और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.16

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