सोमवार, 12 जून 2017

👉 नारी जागरण की दूरगामी सम्भावनाएँ (भाग 1)

🔵 भावनाशील प्रतिभाओं को खोजना, एक सूत्र में बाँधना और उन्हें मिल जुलकर सृजन के लिए कुछ करने में जुटाना- सतयुग की वापसी का शिलान्यास है। इसी के उपरान्त नवयुग का, उज्ज्वल भविष्य का भव्य भवन खड़ा हो सकने का विश्वास किया जा सकता है। इसलिए इसे सम्पन्न करने के लिए इस आड़े समय में किसी भी प्राणवान को निजी कार्यों की व्यस्तता की आड लेकर बगलें नहीं झाँकनी चाहिए। युग धर्म की इस प्रारम्भिक माँग को हर हालत में, हर कीमत पर पूरा करना ही चाहिए।

🔴 इन्हीं दिनों उठने वाला दूसरा चरण है “आद्यशक्ति का अभिनव अवतरण” नारी-जागरण। आज की स्थिति में नारी-नर की तुलना में कितनी पिछड़ी हुई है। इसे हर कोई हर कहीं नजर पसार कर अपने इर्द गिर्द ही देख सकता है। उसे रसाईदारिन-चौकीदारिन, धोबिन और बच्चे जनने की मशीन बन कर अपनी जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। दासी की तरह जुटे रहने और अन्न वस्त्र पाने के अतिरिक्त और भी महत्वाकाँक्षा सँजोने के लिए उस पर कड़ा प्रतिबन्ध है। परम्परा निर्वाह के नाम पर उसे बाधित और प्रतिबंधित रहने के लिए कोई ऐसी भूमिका निभाने की गुँजाइश नहीं है जिससे उसे एक समग्र मनुष्य कहलाने की स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिले।

🔵 संसार में आधी जनसंख्या नारी की है। इस वर्ग का पिछड़ी स्थिति में पड़े रहना समूची मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। इसे अर्धांग-पक्षाघात पीड़ित जैसी स्थिति भी कहा जा सकता है ऐ पहिया टूटा और दूसरा साबुत हो तो गाड़ी ठीक प्रकार चलने और लक्ष्य तक पहुँचने में कैसे समर्थ हो सकती है? एक हाथ वाले, एक पैर वाले निर्वाह भर कर पाते है। समर्थों की तरह बड़े काम सफलता पूर्वक कर सकना उनसे कहाँ बन पड़ता है? आधी जनसंख्या अनपढ़ स्थिति में रहे और दूसरा आधा भाग उसे गले के पत्थर की तरह लटकाए फिरे तो समझना चाहिए कि इस स्थिति में किस प्रकार समय को पूरा किया जा सकेगा किसी महत्वपूर्ण प्रगति की सम्भावना बन पड़ना तो दुष्कर ही रहेगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1988 पृष्ठ 58
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/October/v1.58

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