बुधवार, 17 मई 2017

👉 उठो! जागो!! और साधक बनो!!!

🔵 ध्यान की गहनता में अदृश्य स्पन्दनों के साथ गुरुदेव की वाणी स्फुरित हो उठी-‘‘उठो! जागो!! और देखो, जैसा बाह्य जगत् है वैसा ही एक अन्तर्जगत् भी है। वत्स! यदि बाह्य जगत् में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौन्दर्य है, महान् गौरव है तो अन्तर्जगत् में भी अजेय महानता और शक्ति, अवर्णनीय आनन्द तथा शान्ति और सत्य का अचल आधार है। हे वत्स! बाह्य जगत् अन्तर्जगत् का आभास मात्र है और इस अन्तर्जगत् में तुम्हारा सत्यस्वरूप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो, जबकि बाह्य जगत् समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनन्त और अपरिमेय आनन्द है, जबकि बाह्य जगत में संवेदनाएँ, सुख तथा दुःख से जुड़ी हुई हैं। वहाँ भी वेदना है, किन्तु अहो, कितनी आनन्दमयी वेदना है। सत्य का पूर्णतः साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना और ऐसी वेदना विपुल आनन्द का पथ है।

🔴 आओ, साधक बनो! अपने वृत्ति को इस अन्तर्जगत् की ओर प्रस्तुत करो। वत्स! मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से अधिक घनिष्ठ और भी कोई सम्बन्ध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिवर्चनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। आन्तरिक मौन की गहन गहराइयों में भगवान् विराजमान हैं। युगसाधना के अनिवार्य कर्त्तव्य को करते हुए अपनी आन्तरिकता को मुझसे जोड़ो। स्वयं को मेरे अलौकिक अस्तित्व से एकाकार करो। जो मैं हूँ, तुम वही बनो। भवगत् पवित्रता के लिए भक्तों के हृदय विभिन्न मन्दिर हैं, जहाँ सुगन्धित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसका अध्यात्मीकरण कर लो। रूप-अरूप सभी में ब्रह्म का, देवत्व का दर्शन करो। ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।
  
🔵 अन्तर्गत की अन्तरतम गुहा में, जिसमें व्यक्ति उत्कट गुरुप्रेम या कठोर साधना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वे भौतिक अर्थ में निकट नहीं, किन्तु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में; वे हमारी आत्मा के सारतत्त्व हैं। स्वयं को साधना के लिए समर्पित कर दो। साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरतम का निवासी हूँ। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अनिश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।

🔴 युग सन्धिकाल के इन अन्तिम पलों में समूची मानवता तुम्हारी कठोरतम साधना से झरने वाले अमृत बिन्दुओं की ओर प्यासे चातक की भाँति टकटकी लगाए है। साधना तो वह विरासत है, जो मैंने तुम्हें सौंपी है। इससे प्राप्त होने वाली अनन्तशक्ति तुममें समा जाने के लिए आतुर है।’’ परावाणी की यह गूँज ध्यान के उन्मीलन के बाद भी बनी रही। उनके स्वर अभी भी अन्तर्चेतना में झंकृत हो रहे थे-उठो! जागो!! और साधक बनो!!!

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 72

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न...