बुधवार, 17 मई 2017

👉 नारी को समुचित सम्मान एवं उत्थान दीजिए। (भाग 3)

🔵 प्राचीन काल में भारत में नारी को यह सब अधिकार मिले हुए थे। उनके लिये शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी, समाज में आने-जाने और उसकी गतिविधियों में भाग लेने की पूरी स्वतन्त्रता थी। वे पुरुषों के साथ वेद पढ़ती-पढ़ाती थीं, यज्ञ में होता, ऋत्विज् तथा यज्वा के रूप में योगदान किया करती थीं। यही कारण था कि वे गुण, कर्म, स्वभाव में पुरुषों के समान ही उन्नत हुआ करती थीं और तभी समान एवं समकक्ष स्त्री-पुरुष की सम्मिलित सन्तान भी उन्हीं की तरह गुणवती होती थीं। जब तक समाज में इस प्रकार की मंगल परम्परा चलती रही, भारत का वह समय देव-युग के समान सुख-शान्ति और सम्पन्नता पूर्ण बना रहा, किन्तु ज्योंही इस पुण्य-परम्परा में व्यवधान आया, नारी को उसके समुचित एवं आवश्यक अधिकारों से वंचित किया गया, भारतीय समाज का पतन होना प्रारम्भ हो गया और ज्यों नारी को दयनीय बनाया जाता रहा, समाज अधोगति को प्राप्त होता गया और अन्त में एक ऐसा अन्धकार-युग आया कि भारत का सारा गौरव और उसकी सारी साँस्कृतिक गरिमा मिट्टी में मिल गई।

🔴 कहना न होगा कि जिस प्रकार शिखा सहित ही दीपक, दीपक है, उसी प्रकार सुयोग्य, सुशील और सुगृहिणी के रूप में ही पत्नी, पत्नी मानी जायगी। अयोग्य विवाहितायें वास्तव में पुरुष रूपी शरीर में पक्षाघात के समान ही हैं। जीवनरूपी रथ में टूटे पहिये और उन्नति अभियान में विखण्डित पक्ष की तरह ही बेकार हैं।

🔵 इस रूप में पुरुष की पूर्ति नारी तब ही कर सकती है, जब उन्हें इस कर्तव्य के योग्य विकसित होने का अवसर दिया जाये। जहाँ स्त्रियों को केवल बच्चा पैदा करने की मशीन, विषय-विष का समाधान और चूल्हे-चौके की दासी-भर समझकर रक्खा जायेगा, वहाँ उससे उपर्युक्त पतित्व की अपेक्षा करना मूर्खता होगी।

🔴 हमारे समाज में आज एक लम्बे युग से नारी की उपेक्षा होती चली आ रही है। जिसके फल स्वरूप धर्म भार्या के रूप में उसके सारे गुण और समाज निर्मात्री के रूप में सारी योग्यताएं समाप्त हो गई हैं। उसे पैर की जूती बनाकर रक्खा जाने लगा, जिससे वास्तव में जूती से अधिक उसकी कोई उपयोगिता रह भी नहीं गई है। ऐसी निम्न कोटि में पहुँचाई गई नारी से यदि आज का स्वार्थी एवं अनुदार पुरुष यह आशा करे कि वह गृह-लक्ष्मी बनकर उसके घर को सुख-शान्तिपूर्ण स्वर्ग का एक कोना बना दे, उसकी सन्तानों की सुयोग्य, तो वह दिन के सपने देखता है, आकाश-कुसुम की कामना करता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/April/v1.28

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 6)

🔴 यह तो नमूने के लिए बता रहा हूँ। उसकी ऐसी भविष्यवाणियाँ कवितामय पुस्तक में लिपिबद्ध हैं, जिसे फ्रान्स के राष्ट्रपति मितरॉ सिरहाने रखकर...