शनिवार, 6 मई 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 May

🔴 बूँद-बूँद जोड़ने से घड़ा भर जाता है। पतले धागे मिलकर मोटा, मजबूत रस्सा बनाते हैं। हम सबका सम्मिलित प्रयत्न युग निर्माण के रूप में परिणत हो सकता है। युग बदल सकता है, बशर्ते कि हम स्वयं बदलें। बहुत कुछ हो सकता है, बशर्ते कि हम स्वयं भी कुछ करने को तैयार हों। अपने बदलने, सुधरने और करने की अब आवश्यकता है। इस परिवर्तन के साथ ही हमारा समाज, राष्ट्र और संसार बदलेगा। प्रलोभनों और आकर्शणों में अपने आपको घुलाते रहने की अपेक्षा अब हमें आदर्शवाद की प्रतिस्थापना करने के लिए कष्ट उठाने की भावनाएँ अपने अन्दर उत्पन्न करनी है। यही उत्पादन विश्व  शांति की सुरम्य हरियाली के रूप में दृश्टिगोचर हो सकेगा।                

🔵 नींव पर रखे हुए पत्थरों को कोई नहीं जानता, किन्तु शिखर के कँगूरे सबको दीखते हैं। पर श्रेय इन कँगूरों को नहीं; नींव के पत्थरों को ही रहता है। कँगूरे टूटते-फूटते और हटते-बदलते रहते हैं, पर नींव के पत्थर अडिग है। जब तक भवन रहता है, तब तक ही नहीं, वरन् उसके नष्ट हो जाने के बाद भी वे जहाँ के तहाँ बने रहते हैं। इसी प्रवृत्ति के बने हुए लौह स्तम्भों को ‘युग पुरुष’ कहते हैं। उन्हीं के द्वारा युगों का निर्माण एवं परिवर्तन व्यवस्था सम्पन्न होते हैं।                                                  

🔴 अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को हम उसी दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हममें से हर एक को अपन-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं; जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं, जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी ही आत्मीयता की दृष्टि से देखें और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने-समझें। उपेक्षित बूढ़े लोग जिस प्रकार अपनी बेकार बकझक करते रहते हैं और घर के लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते, यदि वही स्थिति अपनी भी रही, तो हमारा स्वप्न साकार न हो सकेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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