शुक्रवार, 19 मई 2017

👉 नर और नारी के मध्यवर्ती अनुदान प्रतिदान (भाग 1)

🔵 स्त्री के व्यक्तित्व की बनावट ऐसी है, कि अपने पति, बच्चे एवं परिवार के साथ घुल-मिल जाती है। पुरुष के लिए इसमें जितनी कठिनाई पड़ती है, स्त्री को उतनी नहीं। इसका अर्थ है, आत्मीयता का विस्तार। जिस घर में बचपन, किशोरावस्था पार कर यौवन की देहली पर पहुँचती है, जिन सहेलियों के साथ खेलती और जिन कुटुम्बियों के साथ इतनी आयु बिताती है, उसे छोड़कर सर्वथा नये परिवार में जा पहुँचना और सर्वथा अपरिचित लोगों को अपना बना लेना, सर्वथा अपने को उनमें घुला देना, असाधारण बात है। पति का एक दिन का परिचय दूसरे दिन इतनी घनिष्ठता में बदल जाना, मानो उसी के साथ पालन-पोषण हुआ हो, वस्तुतः आश्चर्य की बात है। पुरुष को उस सीमा तक इतनी जल्दी जा पहुँचना कठिनाई की बात है। आत्मीयता के क्षेत्र में इतनी जल्दी इतनी प्रगति करना पुरुष के लिए कठिन है।

🔴 यदि परिचय न हो और पिछले दिनों से घनिष्ठता न चल रही हो, तो स्त्री के प्रति पुरुष के मन में कौतूहल आश्चर्य अजनबीपन और अविश्वास बना रहता है। उसे दूर करने में देर लगती है।

🔵 नारी का निर्माण कुछ ऐसे तत्वों से हुआ है कि वह समर्थ और सुयोग्य होते हुए भी समर्पण कर सकती है। यह समर्पण परावलम्बन नहीं है। बच्चों को वह प्राणप्रिय मानने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं, कि वह उनके आश्रित है या उनसे कोई प्रतिदान प्राप्त करती है। यही बात पति या समूचे परिवार के प्रति है। उसका श्रम, समर्पण इतना बहुमूल्य है कि उसका मूल्याँकन पैसों में नहीं किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 46
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/November/v1.46

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