शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

👉 परंपरा जब अंधी हो जाती है

🔵 बात उन दिनों की है जब रूस में जार अलेक्जेंडर का शासन था। उसके व्यक्तिगत निवास में बहुत थोडे और विश्वसनीय लोग ही पहुँच सकते थे, इसलिए कितने ही रहस्य ऐसे थे, जो औरो तक कभी प्रकट नहीँ नहीं हो सके।

🔴 एक दिन प्रशा के राजदूत बिस्मार्क जार से भेंट करने उनके महल पर गये। बिरमार्क जहाँ बैठे थे उसके ठीक सामने खिड़की पडती थी बहुत पीछे तक का बाहरी दृश्य भी वहाँ से अच्छी तरह दिखाई दे रहा था। बिस्मार्क ने देखा कि बहुत देर से एक रायफलधारी संतरी मैदान मे खडा है जबकि रक्षा करने जैसी कोई वस्तु वहाँ पर नहीं है। शांतिकाल था- इसलिये सैनिक गश्त जैसी कोई बात भी नहीं थी।

🔵 बडी़ देर हो गई तब बिस्मार्क ने जार से पूछा-यह संतरी क्यों खडा़ है? जार को स्वयं भी पता नहीं था कि संतरी वहाँ किस बात का पहरा दे रहा है ?

🔴 जार ने अपने अंगरक्षक सेनाधिकारी को बुलाया और पूछा- यह संतरी इस पीछे के मैदान में किसलिए नियुक्त किया जाता है ? सेनाधिकारी ने बताया-सरकार! यह बहुत दिनों से ही यही खड़ा होता चला आ रहा है। जार ने थोडा कडे़ स्वर में कहा- यह तो मैं भी देख रहा हूँ मेरा प्रश्न यह है कि संतरी यहाँ किसलिए खडा होता है ' जाओ और पता लगाकर पूरी बात मालूम करो।''

🔵 सेनाधिकारी को कई दिन तो यह पता लगाने में ही लग गए थे। चौथे दिन सारी स्थिति का पता कर वह जार के सम्मुख उपस्थित हुआ और बताया- 'पुराने सरकारी कागजात देखने से पता चला कि ८० वर्ष पहले महारानी कैथरीन के आदेश से एक संतरी वहां खडा किया गया था। बात यह थी कि एक दिन जब वे घूमने के लिए निकली, तब इरा मैदान में बर्फ जमा थी। सारे मैदान में एक ही फूल का पौधा था और उसमें एक बहुत सुंदर फूल खिला हुआ था। कैथरीन को वह फूल बेहद सुंदर लगा सो उसकी सुरक्षा के लिए तत्काल वहाँ एक संतरी खडा़ करने का आदेश दिया और इस तरह वहाँ संतरी खडा़ करने की परपरा चल पडी़। ८० वर्ष हो गए न किसी ने आदेश को बदला, न किसी ने उसकी आवश्यकता अनुभव की, सो उस स्थान पर व्यर्थ ही पहरेदारी बराबर चलती आ रही है। जार को गुस्सा भी आया और हँसी भी। गुस्सा इसलिए कि परंपराओं का निरीक्षण न होने से यह खर्च व्यर्थ ही होता रहा और हँसी इसलिये कि पहले तो एक भी फूल था पर ८० वर्ष से तो उस मैदान में अच्छी घास भी नहीं है, न जाने संतरी किसकी रखवाली कर रहा है ?

🔴 कहानी यहाँ समाप्त नहीं हो गई वरन् सही कहानी अब प्रारंभ होती है और वह यह है कि समाज में स्वय आज दहेज, पर्दा प्रथा जाति-पाँति ऊँच-नीच, मृतक भोज स्वस्थ परंपरा के रूप में प्रचलित किए गये थे। अब अंध परंपरा बन चुके हैं। वर्तमान परिस्थितियों में न तो उनकी आवश्यकता है और न उपयोगिता फिर भी न तो कोई यह देख रहा कि यह परंपराऐं आखिर किस उद्देश्य से बनी थी और न ही कोई उन्हें मिटाने का साहस कर रहा है। हम व्यर्थ ही उपहास और अपव्यय के पात्र बने उन्हें अपने छाती से वैसे ही चिपकाए है जैसे-रूस का यह बिना कारण-पहरा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 125, 126

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