शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 30)

🌹 युग परिवर्तन प्रतिभा ही करेगी

🔵 प्रतिभाओं का निखार दूसरे तो क्या, किसी की भी कृपा-अनुकंपा के ऊपर निर्भर नहीं है। वह तो पूरे तरह अपने बस की बात है। शरीर से इच्छानुसार काम लिया जा सकता है। उस पर पूरा नियंत्रण अपना रहता है। जो लोग संसार के वर्तमान प्रचलनों की बातों को ही सब कुछ मानते हैं, उन्हें क्या कहा जाए अन्यथा अपने मनोबल और प्रयास को यदि दिशाबद्ध किया जा सके तो हर व्यक्ति अंत: की प्रेरणा से न जाने क्या से क्या कुछ करके दिखा सकता है। यह नया प्रयोग नहीं है। भूतकाल में ऐसे ही प्रयोग होते रहे हैं। युग बदलते रहे और मनुष्य अपनी प्रथा-परम्पराओं में आमूलचूल परिवर्तन करता रहा है। इस बार की महाकाल द्वारा दी गई चुनौती को अस्वीकार करते न बन पड़ेगा।                   

🔴 गाँधी, बुद्ध, ईसा आदि के धार्मिक आंदोलनों को सफल बनाने के पीछे भगवान् की इच्छा कार्य करती रही है। इस बार प्रतिभावानों की पूर्ति का सरंजाम जुट रहा है। समय रहते वह पूरा भी होगा। यह संभावना अधूरी न रहेगी; क्योंकि प्रतिभावानों में हुंकार जब भी उठी है, उसने विशिष्ट स्तर की प्रतिभाओं को विकसित किया है। यह प्रतिभावानों की विशेषता रही है। इसके लिये शरीरबल, साधनाबल, बुद्धिबल की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी कि गाँधी, बुद्ध, विनोबा जैसे प्रतिभावानों की। समय स्वल्प हो तो भी अपने संपर्क क्षेत्र में प्रतिभा का परिचय देने वाले मनस्वी तो हर किसी को उभार सकते हैं, और गीध, गिलहरी, शबरी, भील जैसे चमत्कार प्रस्तुत कर सकते हैं, जो छोटों के लिये भी संभव हो सकता है।

🔵 इक्कीसवीं सदी में आंदोलन की भागीदारी स्वीकार करने के लिये भाव-संवेदना के धनी वर्ग का आह्वान किया गया है। आरंभ की दृष्टि से हल्के काम सौंपे गये हैं- युगसंधिपुरश्चरण के अंतर्गत जप, साधना, समयदान, अंशदान, साप्ताहिक सत्संग, झोला-पुस्तकालय आदि। उन्हें हल्के दरजे के स्काउट व्यायाम स्तर का समझा जाए, जिससे अभिरूचि और आस्था की परिस्थिति बढ़ चले।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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