मंगलवार, 3 जुलाई 2018

👉 बुद्धिमानों! मूर्ख क्यों बनते हो!

🔷 मनुष्य की बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। उसकी चतुरता, क्रिया- कुशलता और सोचने की अद्भुत शक्ति की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है। सृष्टि का मुकुटमणि होने का गौरव उसने अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर प्राप्त किया है और विविध दिशाओं में अनेकानेक आविष्कार करके अपने को साधन- संपन्न बनाया है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य में मूर्खता का मात्रा कम नहीं है।

🔶 हम नित्य असंख्यों को मरते हुए देखते हैं, पर अपने आपको अमर जैसा अनुभव करके काम और लोभ के फंदे में फँसे रहते हैं। पाप के दुष्परिणामों से असंख्य प्राणी दु:ख से बिलबिलाते हुए देखे जाते हैं। उन्हें देखते हुए भी हम पाप करते हैं और सोचते हैं कि पाप के फल से मिलने वाले दु:ख से बचे रहेंगे। क्षणिक सुखों के बदले चिरकालीन सुख- शांति को ठुकराते रहने वालों की संख्या कम नहीं है। इन क्रिया- कलापों को किस प्रकार बुद्धिमानी कहा जाएगा?

🔷 सांसारिक मनोरंजन की बातों में बुद्धिमानी दिखाना और आत्मस्वार्थ को भूले रहना, यह कहाँ की समझदारी है? पाठको! मूर्ख मत बनो। मनुष्योचित बुद्धिमत्ता को अपनाओ। खिलौने रंगने के लिए अपना रक्त मत बहाओ। सच्चे स्वार्थ को ढूँढो और परमार्थ की ओर कदम बढ़ाओ। परमार्थ से बढ़कर कोई स्वार्थ नहीं है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति – नवम्बर 1948 पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1948/November/v1.1

👉 अनन्त संभावनाओं से युक्त मानवी सत्ता

🔶 बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएँ छिपी पड़ी हैं। सामान्य स्थिति में वे दिखाई नहीं पड़ती, पर जैसे ही बीज के उगने की परिस्थितियाँ प्राप...