शनिवार, 1 अप्रैल 2017

👉 रवींद्र की काव्य-साधना-गीतांजलि

🔴 आठ-नौ साल की आयु के रवींद्रनाथ को जब स्कूल में पढ़ने को भेजा गया तो शीघ्र ही एक दिन वहाँ से लौटने पर उन्होंने कहा- पिताजी मैं कल से स्कूल में पढ़ने नहीं जाऊंगा। वह तो कारागार है। वहाँ बालकों को दंड दिया जाता है, उन्हें बेंचों पर खडा कर दिया जाता है और फिर उन पर कक्षा की सभी स्लेटों का बोझ लाद दिया जाता है और फिर वहाँ कोई आकर्षण भी तो नहीं है। वही डेस्क, वही बेंच, सुबह से शाम तक एक-सी ही बातें होती रहती हैं।

🔵 पिता ने पुत्र की व्यथा को समझ लिया और शिक्षकों से कह दिया- यह बालक पढने के लिए पैदा नहीं हुआ। हम स्कूल वालों को जो वेतन देते हैं, वह केवल इसलिये है कि यह वहाँ बैठा रहे।'' पुस्तकों को याद करने और रटने के बजाय बाल्यावस्था में रविबाबू अपने विशाल भवन के एक बरामदे में रखी हुई पुरानी पालकी में घुसकर बैठ जाते। उस अँधेरे स्थान में पहुँचकर वे कल्पनाओं में निमग्न हो जाते। उस अवस्था में उनकी पालकी सैकडों कहारों के कंधों पर लदी हुई अनेक वन, पर्वतों को पार करती पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक जा पहुँचकर स्थल का मार्ग समाप्त हो जाता और कहार कहने लगते है- अब आगे रास्ता नहीं है, अन्नदाता! सब तरफ जल ही जल ही दीख पड़ता है।'' पर बालक रवींद्र कल्पना की उडान में कब मानने वाला था ? उसकी पालकी असीम जलराशि पर तैरने लगती। कितनी ही प्रचंड लहरें पालकी से टकराती कितने ही भीषण तूफान आते, किंतु उसकी पालकी बराबर आगे बढ़ती हुई उस पार पहुँच जाती। उस प्रदेश के सुंदर भवन, बाग, संगीत और गान-वाद्य की स्वर लहरी नृत्य आदि उसे आनंद विभोर कर देते। वह स्वयं भी मस्त होकर कुछ गुनगुनाने लगता।

🔴 और कुछ साल बाद वास्तव में ऐसा समय आया जब बाल्यावस्था का स्वप्न साकार होने लगा। कवि अपनी रचनाओं के बल पर जहाज रूपी पालकी द्वारा योरोप, अमरीका तक जा पहुँचे, वहाँ के बडे-बडे विद्वानों, गुणवानों, श्रीमानों ने आपका स्वागत-सत्कार बडे प्रेम से किया। वहाँ के नर-नारी आपकी प्रतिभा और अपूर्व सौंदर्य पर मुग्ध हो गये और सैकड़ों विशाल सभाओं और गोष्ठियों में उन देशों के सर्वोत्तम संगीत और कला-प्रदर्शन द्वारा आपका स्वागत किया गया। धार्मिक जनों को आप ईसाइयों के किसी प्राचीन संत की तरह जान पडते थे और वे बड़ी श्रद्धा से आपके चोगे (लबादा) का दामन चूमने लगते थे।

🔵 कवि जब अपनी "गीतांजलि" की कविताओं को गाकर सुनाने लगते तो श्रोता मुग्ध होकर भाव-विभोर हो जाते और चारों तरफ से रवि बाबू पर साधुवादों की वर्षा होने लगती। अंत में वहाँ का विद्वान् समाज इनकी बहुमुखी प्रतिभा और योग्यता से इतना प्रभावित हुआ कि उस महाद्वीप का सर्वश्रेष्ठ समझा जाने वाला सवा लाख डॉलर का "नोबल पुरस्कार" "गीतांजलि" के उपलक्ष्य में उन्हीं को प्रदान किया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय ने विद्या की सबसे बडी़ उपाधि डी० लिट० (डॉक्टर आफ लिटरेचर) प्रदान की और समस्त देश ने एक स्वर से उनको "विश्वकवि" घोषित कर दिया। "गीतांजलि'' की महिमा-गान करते हुए कहा गया-

🔴 'यह आध्यात्मिक भावनाओं का सार है। इसमें वैष्णव कवियों की प्रेम भावना का अनुपम सम्मिश्रण है। उपनिषदों के सारगर्भित विचारों का इसमें बड़ी मार्मिकता से समावेश किया गया है और बताया गया है कि जो मनुष्य संपूर्ण प्राणियों में ईश्वर को देखता है। वह कभी न तो पाप कर सकता है और न पाप से प्रभावित हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को मृत्यु तक का भय नहीं जान पडता, क्योंकि भगवान् को अपने अंतर में देख लेने पर वह अमर जीवन हो जाता है। आज भी गीतांजलि से यही वाणी मुखरित हो रही है।

 🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ ११६, ११७

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