शनिवार, 1 अप्रैल 2017

👉 नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन (भाग 3)

🔴 गाँधी जी तीस साल की उम्र के थे । आंतें सूख गयी थीं। रोज एनीमा से दस्त कराते थे। उनने लिखा है कि जब वे दक्षिणी अफ्रीका में थे तो सोचते थे कि यही कोई पाँच बरस और जियेंगे। एनीमा सेट कोई उठा ले गया व जंगल में फँस गए तो बेमौत मारे जाएँगे। जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गाँधी जी ने अपने आपको ठीक कर लिया, सुधार लिया अपना आहार ठीक कर लिया तो आंतें भी उसी क्रम से ठीक होती चलीं गयी। 80 वर्ष की उम्र में वे मरे, मरने से पहले वे कहते थे अभी हम 120 साल तक जियेंगे । मेरा ख्याल है कि वे जरूर जिये होते यदि गोली के शिकार नहीं होते ।

🔵 जब गाँधीजी की आंतें उन्हें क्षमा कर सकती हैं शरीर उन पर दया कर सकता है तो आपके साथ यह क्यों नहीं हो सकता? शर्त एक ही है कि आप अपनी जीभ को छुट्टल साँड़ की तरह न छोड़कर उस पर काबू करना सीखें । जीभ ऐसी जिसने आपकी सेहत को खा लिया, आपके खून को खा लिया, माँस को खा लिया। कौन जिम्मेदार है-जीवाणु वातावरण । नहीं आप स्वयं व आपकी यह जीभ। यदि आप इसे काबू में कर सके तो मैं बीमारियों की ओर से मुख्तार नामा लिखने को तैयार हूँ कि आपको कभी बीमारी नहीं होने वाली।

🔴 ऐसे कई नमूने मेरे सामने हैं, जिसमें लोगों ने नेचर के कायदों का पालन कर के अपनी बीमारी को दूर भगा दिया। चंदगीराम भरी जवानी में तपेदिक के मरीज हो गए थे । कटोरा भर खून रोज कफ के साथ निकलता था। हर डॉक्टर ने कह दिया था कि उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। एक सज्जन आए व बोले आप अगर मौत को पसंद करते हों तो उस राह चलिए व यदि जिंदगी पसंद हो तो मेरे बताए मार्ग पर चलिए। जिंदगी का रास्ता क्या अपने ऊपर संयम जीभ पर संयम। आहार का संयम-विहार का संयम। शरीर से श्रम कीजिए व वर्जिश कीजिए। प्राणों का सागर चारों तरफ भरी पड़ा है, खींचिए, सादा भोजन कीजिए व सीमा में करिए । फिर देखिए, क्या होता है? देखते-देखते टीबी का रोगी वह व्यक्ति पहलवान चन्दगीराम बन गया।

🔵 आप में से हर व्यक्ति पहलवान बन सकता है, अपनी कमजोरियाँ ठीक कर सकता है, अपनी सेहत ठीक कर सकता है, अपनी परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बना सकता है, तनावभरी इस दुनिया में भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकता है। पर क्या करें मित्रों? आप दूसरों को -उसकी कमियों को तो खूब देखते हैं पर अपनी कमियों गलतियों असंयमों को कम देखते हैं। अपने आप पर नियंत्रण बिठाने का आपका कोई मन नहीं है। इसीलिए मैं आपको कभी अध्यात्मवादी नहीं कह सकता। मात्र दीन-दुर्बल आदतों का गुलाम भर कह सकता हूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1992/April/v1.56

👉 हीरों से भरा खेत

🔶 हफीज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिंदगी से खुश और संतुष्ट था। हफीज खुश इसलिए था कि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह ...