रविवार, 2 अप्रैल 2017

👉 उपासनाएँ सफल क्यों नहीं होतीं? (भाग 2)

🌹 नवरात्रि साधना के संदर्भ में विशेष -

🔴 भगवान और देवता कहाँ हैं? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है? इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि यह दिव्य चेतनसत्ता निखिल विश्वब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणु-गति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं, उन्हें पुरा करने में संलग्न हैं। उनके समक्ष असंख्य कोटि प्राणियों की, जड़-चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को सँभालने का विशाल काय काम पड़ा है, सो वे उसी में लगी रहती हैं एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य संलग्नक रखता है।

🔵 व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना उनके लिए समग्र रूप से सम्भव नहीं। वे ऐसा करती तो हैं, पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा। दिव्यसत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश प्रतिनिधि ही उन व्यक्ति की इकाई को देखता-सँभालता है। वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वारा सम्पन्न होती है।

🔴 व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप ही यह देव अंश समर्थ बनते हैं। या दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो, तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यन्त समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधक ही आशा-जनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अंतरंग में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना-रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्र-जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।

🔵 विराट बाह्य कितना ही महान क्यों न हो, व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होगा। अन्तरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है, पर वह हर अन्तःकरण में समान रूप में प्रबल नहीं होती। सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों का एक झोंका घुस जाएँ, तो भी उसकी अन्तरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिए उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं प्रायश्चित किये बिना भी चैन न पड़ेगा। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरन्तर क्रूर-कर्म ही करता रहता है, उनकी अन्तरात्मा यदाकदा बहुत हलका-सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 ईश्वर क्या है?

🔶 टेहरी राजवंश के 15-16 वर्षीय राजकुमार के हृदय में एक  प्रश्न उठा  ईश्वर क्या है? 🔷 वह स्वामी रामतीर्थ के चरणों में पहुँचा और प्रणाम ...