शनिवार, 11 मार्च 2017

👉 अभिभावक की गलती का दंड भी उसे ही

🔴 बात बहुत दिनों की है, जब गाँधीजी दक्षिण अफ्रीका के फिनिक्स आश्रम में रहते थे। आश्रम के नियमानुसार विद्यार्थियों को कई-कई दिन का अस्वाद व्रत कराया जाता था। कौन, कब और कितने दिन का अस्वाद व्रत करेगा इसका निश्चय गाँधीजी ही किया करते थे।

🔵 एक दिन भोजन मे खिचडी के साथ कढी़ भी बनी। खिचडी बिना नमक की थी; जिन्हें अस्वाद व्रत करना था, उन्हें केवल खिचड़ी दी जानी थी; जिन्हें अस्वाद व्रत नहीं करना था, वे कढी भी ले सकते थे।

🔴 आश्रम में दूध-दही का प्रयोग कम होता था, इसलिए हर विद्यार्थी की यह इच्छा थी कि हमें भी कढी़ खाने को मिले, लेकिन गाँधी जी अपने निश्चय के बडे पक्के थे। उन्होंने कहा-व्रत तोड़ने से आत्मा कमजोर होती है, इसलिये जीभ के स्वाद के लिये व्रत नहीं तोड़ा जा सकता जो लोग उसका कडा़ई से पालन नहीं कर सकते उनके लिए उचित था, वे पहले से ही व्रत न लेते, पर व्रत लेकर बीच मे भंग करना तो एक तरह का पाप है।

🔵 विद्यार्थी मन मारकर रह गये। कढ़ी उन्हें ही मिली जो नमक ले सकते थे। शेष के लिए गाँधी जी ने घोषणा कर दी कि जिस दिन उनका व्रत पूरा हो जायेगा उनके लिए कढ़ी बनवा दी जायेगी। लड़के चुप पड़ गए। जिसे जो निर्धारित था भोजन कर लिया।

🔴 लेकिन गाँधी जी के पुत्र देवदास अड गये कि मुझे तो आज ही कडी़ चाहिए। गाँधी जी के पास खबर पहुँची तो उन्होंने देवदास को बुलाकर पूछा- अभी तुम्हारा अस्वाद व्रत कितने दिन चलेगा आठ दिन देवदास बोले-लेकिन मैं नौ दिन, दस दिन कर लूँगा पर आज तो मुझे कडी़ मिलनी ही चाहिए। मेरा कडी़ खाने का मन हो रहा है।

🔵 दुःखी होकर गाँधी जी बोले-बेटा दूध, दही, टमाटर, रोटी, तेल जो कुछ चाहिए ले लो नमक वाली कडी तो आज तुझे नहीं मिलेगी। तू ही आश्रम के नियमों का पालन न करेगा तो और विद्यार्थियो में वह दृढता कहाँ से आयेगी ?

🔴 गाँधी जी की सीख का भी देवदास पर कोइ प्रभाव नहीं पडा। वे वहीं खडे-खडे रोने लगे। सारे आश्रमवासी खडे कौतूहलवश देख रहे थे कि आगे क्या होता है?

🔵 देवदास का रोना देखकर गाँधी जी बडे दुःखी हुए। एक बार तो उनके मन में आया कि देवदास को दंड दिया जाए, पर तभी उनके मन में विचार आया कि कुछ दिन पहले वे स्वयं भी ऐसे ही किया करते थे। घर में अक्सर अच्छी चीजो के लिए मचल जाया करते थे, तब उन्हें ऐसा करते बालक देवदास भी देखा करता था, यह उसी का तो फल है कि आज देवदास भी वही कर रहा है।

🔴 अभिभावक जो काम लड़कों के लिए पसंद नहीं करते पहले उन्हे अपने से वह आदत दूर करनी चाहिए। अपनी भूल को न सुधारा जाए तो लडकों को आदर्शवादी नहीं बनाया जा सकता। इसमें दोष देवदास का नहीं मेरा है, फिर दंड भी देवदास को क्यों दिया जाए ?

🔵 घबराते हुए गाँधी जी ने, सबके सामने अपने गाल पर जोर-जोर से दो तमाचे मारे और कहा-देवदास यह मेरी भूल का परिणाम है, जो तू आज यों मचल रहा है, अपनी भूल की सजा तुझे कैसे दे सकता हूँ उसे तो मुझे ही भोगना चाहिए।

🔴 इस बात का देवदास पर ऐसा प्रभाव पडा कि फिर कढी़ के लिए उसने एक शब्द भी नहीं कहा और अपना अस्वाद व्रत नियमपूर्वक पूरा किया।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 77, 78

👉 Who is Religious?

🔷 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natu...