शनिवार, 11 मार्च 2017

👉 हमारी होली

ऐसी होली जले ज्ञान की ज्योति जगत में भर दे।
कलुषित कल्मष जलें, नाश पापों तापों का कर दे॥

🔵 होलिकोत्सव का यह त्योहार उस प्यास की एक धुँधली तस्वीर है जिसकी इच्छा आदमी को हर समय बनी रहती है। मौज! आनंद! खुशी! प्रसन्नता! हर्ष! सुख! सौभाग्य! कितने सुन्दर शब्द हैं इनका चिन्तन करते ही नसों एक बिजली सी दौड़ जाती है। आदमी युगों से आनन्द की खोज कर रहा है उसका अन्तिम लक्ष्य ही अखण्ड आनन्द है। यह राजहंस मोतियों की तलाश में जगह-जगह भटकता फिरता है। विभिन्न प्रकार के पत्तों पर पड़ी हुई ओस की बूँदें उसे मोती दीखती हैं, उन्हें लेने के लिए बड़े प्रयत्न के साथ वहाँ तक पहुँचता है, पर चोंच खोलते ही यह गिर पड़ती हैं और राजहंस अतृप्त का अतृप्त ही बना रहता है।

🔴 एक पौधे को छोड़ कर दूसरे पर दूसरे को छोड़ कर तीसरे पर और तीसरे को छोड़ कर चौथे पर जाता है पर संतोष कहीं नहीं मिलता। वह भ्रमपूर्ण स्थिति में पड़ा हुआ है। जिन्हें वह मोती समझता है असल में ओस की वे बूँदें मोती हैं नहीं। वह तो मोतियों की एक झूठी तस्वीर मात्र हैं। तस्वीरों से आदमी टकरा रहा है। दर्पण की छाया को अपनी कार्य संचालक बनाना चाहता है। इस प्रयत्न में उसने असंख्य युगों का समय लगाया है। परन्तु तृप्ति अब तक नहीं मिल पाई है। मनोवाँछा अब तक पूरी नहीं हो सकी है।

🔵 आनंद की खोज में भटकता हुआ इंसान,दरवाजे दरवाजे पर टकराता फिरता है। बहुत सा रुपया जमा करें, उत्तम स्वास्थ्य रहे, रमणियों से भोग करें, सुस्वादु भोजन करें, सुन्दर वस्त्र पहनें, बढ़िया मकान और सवारियाँ हों, नौकर चाकर हों, पुत्र, पुत्रियों, वधुओं से घर भरा हो, उच्च अधिकार प्राप्त हो, समाज में प्रतिष्ठा हो, कीर्ति हो, यह चीजें आदमी प्राप्त करता है। जिन्हें यह चीजें उपलब्ध नहीं होतीं वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जिनके पास हैं वे उससे भी अधिक लेने का प्रयत्न करते हैं। कितनी ही मात्रा में यह चीजें मिल जाएं पर पर्याप्त नहीं समझी जातीं जिससे पूछिये यही कहेगा ‘मुझे अभी और चाहिये।’ इसका एक कारण है, स्थूल बुद्धि तो समझ भी लेती है कि काम चलाने के लिये इतना काफी है, पर सूक्ष्म बुद्धि भीतर ही भीतर सोचती है यह चीजें अस्थिर हैं किसी भी क्षण इनमें से कोई भी चीज कितनी ही मात्रा में बिना पूर्व सूचना के नष्ट हो सकती है।

🔴 इसलिये ज्यादा संचय करो ताकि नष्ट होने पर भी कुछ बचा रहे। यही नष्ट होने की आशंका अधिक संचय के लिए प्रेरित करती रहती है। फिर भी नाशवान चीजों का नाश होता ही है। यौवन ठहर नहीं सकता, लक्ष्मी किसी की दासी नहीं है, मकान, सवारी,घोड़े ,कपड़े भी स्थायी नहीं, भोजन और मैथुन का आनन्द कुछ क्षण ही मिल सकता है। हर घड़ी उसकी प्राप्ति होती रहना असंभव है। जिनकी आज कीर्ति छाई हुई है कल ही उनके माथे पर ऐसा काला टीका लग सकता है कि कहीं मुँह दिखाने को भी जगह न मिले। सारे आनंदों को भोगने के मूल साधन शरीर का भी तो कुछ ठिकाना नहीं। आज ही बीमार पड़ सकते हैं, कल अपाहिज होकर इस बात के मुहताज बन सकते हैं कि कोई मुँह में ग्रास रख दे तो खालें और कंधे पर उठा कर ले जाय तो टट्टी हो आवें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति मार्च 1940 पृष्ठ 4
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Awakening the Inner Strength

🔶 Human life is a turning point in the evolution of consciousness. One who loses this opportunity and does not attempt awakening his in...