शनिवार, 25 मार्च 2017

👉 दीक्षा और उसका स्वरूप (अंतिम भाग)

🌹 प्रगति के कदम-प्रतिज्ञाएँ

पुण्य बढ़ाएँ-

🔴 दक्षिणा संकल्प- इसके बाद में दाहिने हाथ पर चावल, फूल और जल लेकर के जो संस्कार कराने वाले व्यक्ति हों, वे संकल्प बोलें, संकल्प बोलने के पीछे जो प्रतिज्ञा है, उसकी घोषणा की जाए अथवा लिख करके या छपे हुए पर्चे पर दोनों प्रतिज्ञा हमने क्या छोड़ा और क्या नहीं छोड़ा? वह दक्षिणा- पत्रक के रूप में लाकर के लाल मशाल के सामने- गायत्री माता के सामने प्रस्तुत कर देना चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि अपने ज्ञानयज्ञ की लाल मशाल- यही अपना गुरु है। गायत्री माता ही अपना गुरु है। गायत्री माता को ही गुरु मानना चाहिए और लाल मशाल को ही गुरु माना जाना चाहिए, व्यक्तियों को नहीं।          

🔵 व्यक्तियों के लिये अब मैं सख्त मना करता हूँ। कोई व्यक्ति गुरु बनने की कोशिश न करे, क्योंकि जहाँ तक मेरे देखने में आया है कि बहुत ही कम या नहीं के बराबर ऐसे लोग हैं, जो व्यक्तिगत रूप से गुरु दीक्षा देने में समर्थ हैं। खास तौर से अपने गायत्री परिवार की सीमा के अंतर्गत ये बातें बहुत ही मजबूती के साथ जमा देनी चाहिए कि अब कोई व्यक्ति उद्दण्डता न फैलाने पाए। ठीक है मैं जब तक रहा दीक्षा देता रहा। लेकिन मेरी जीवात्मा ने कहा- मैं इसका अधिकारी हूँ। तभी मैंने ये कदम उठाया।           

🔴 लेकिन मैं देखता हूँ, असंख्य मनुष्य जो बिलकुल अधिकारी नहीं हैं, इस बात के, अपने आपको झूठ- मूठ और दूसरों को ठगने के लिए अपने आपको ऐसा बताते हैं, हम गुरु हैं, हम इस लायक हैं, वह लोग इस योग्य बिल्कुल नहीं हैं। हमको इस झगड़े में पड़ने से बचना चाहिए। जिस तरीके से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का झण्डा ही गुरु होता है, जिस तरीके से सिक्खों में गुरुग्रंथ साहब ही गुरु होता है, इसी तरीके से अपनी गायत्री परिवार- युग निर्माण परिवार के अंतर्गत गुरु केवल लाल मशाल को माना जाना चाहिए।

ये दसवाँ अवतार है, आपको याद रखना चाहिए। नौ अवतार पहले हो चुके हैं, यह दसवाँ अवतार अपनी यह लाल मशाल है, इसको निष्कलंक अवतार भी कह सकते हैं। यह निष्कलंक अवतार और लाल मशाल अब हम सबका यही गुरु होगा। आइन्दा से यही गुरु होगा और आइन्दा से हरेक गायत्री परिवार के व्यक्ति और मेरे चले जाने के बाद में मुझे भी गुरु मानने वाले व्यक्ति केवल इस लाल मशाल को ही गुरु मानेंगे और यह मानेंगे यही हमारा गुरु है। श्रद्धा इसी के प्रति रखेंगे और ज्ञान के प्रकाश की ज्योति इसी से ग्रहण करेंगे। इसके पीछे भगवान् की और संभवतः मेरी भी कुछ प्रेरणा भरी पड़ी है। इस मर्यादा का पालन करने वालों को सबको लाभ मिलेगा। इस तरीके से गुरु दीक्षा और यज्ञोपवीत संस्कारों के क्रिया- कृत्य को पूरा किया जाना चाहिए।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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