शनिवार, 25 मार्च 2017

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 25)

🌹 प्रखर प्रतिभा का उद्गम-स्रोत 

🔵 योगदर्शन में अष्टांग-साधना में सर्वप्रथम यम-नियम की गणना की गई है। यह अंतरंग और बहिरंग सुव्यवस्था के ही दो रूप हैं। जिसने इस दिशा में जितनी प्रगति की, समझना चाहिये कि उसे उतनी ही आत्मिक प्रगति हस्तगत हुई और उसकी क्षमता उस स्तर की निखरी, जिसका वर्णन महामानवों में पाई जाने वाली ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में किया जाता है। उपासनात्मक समस्त कर्मकाण्डों की सरंचना इसी एक प्रयोजन के लिये हुई है कि व्यक्ति की पशु-प्रवृत्तियों के घटने और दैवी संपदाओं के बढ़ने का सिलसिला क्रमबद्ध रूप से चलता रहे। यदि उद्देश्य का विस्मरण कर दिया जाए और मात्र पूजापरक क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यह चिह्न−पूजा को निर्जीव उपक्रम ही माना जाएगा और उतने भर से बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों की आशा करने वालों को निराश ही रहना पड़ेगा।                 

🔴 समर्थ पक्षियों के नेतृत्व में अनेक छोटी चिड़ियाँ उड़ान भरती हैं। बलिष्ठ मृग के परिवार में आश्रय पाने के लिये उसी जाति के अनेक प्राणी सम्मिलित होते जाते हैं। च्यूँटियाँ कतार बनाकर चलती हैं। बलिष्ठ आत्मबल के होने पर दैवी शक्तियों का अवतरण आरंभ हो जाता है और साधक क्रमश: अधिक सिद्ध स्तर का बनता जाता है। यही है वह उपलब्धि, जिसके सहारे महान् प्रयोजन सधते और ऐसे गौरवास्पद कार्य बन पड़ते हैं, जिन्हें सामान्य स्तर के लोग प्राय: असंभव ही मानते रहते हैं।   

🔵 बड़ी उपलब्धियों के लिये प्राय: दो मोर्चे संभालने पड़ते हैं-एक यह कि अपनी निजी दुर्बलताओं को घटाना-मिटाना पड़ता है। उनके रहते मनुष्य में आधी-चौथाई शक्ति ही शेष रह जाती है, अधिकांश तो निजी दुर्बलताओं के छिद्रों से होकर बह जाती है। जिनके लिये अपनी समस्याओं को सुलझाना ही कठिन पड़ता है, वह व्यापक क्षेत्र के बड़े कामों को सरंजाम किस प्रकार जुटा सकेंगे। भूखा व्यक्ति किसी भी मोर्चे पर जीत नहीं पाता। इसी प्रकार दुर्गुणी व्यक्ति स्वयं अपने लिये इतनी समस्याएँ खड़ी करता रहता है, जिनके सुलझने में उपलब्ध योग्यता का अधिकांश भाग खपा देने पर भी यह निश्चय नहीं होता कि अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य संपादित करने के लिये कुछ सामर्थ्य बचेगी या नहीं।      
    
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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