सोमवार, 27 मार्च 2017

👉 कर्म की स्वतंत्रता

🔵 समस्त योनियों में से केवल मनुष्य योनि ही ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है। ईश्वर की ओर से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इसलिए प्रदान किए गए हैं कि वह प्रत्येक काम को मानवता की कसौटी पर कसे और बुद्धि से तोल कर, मन से मनन करके, इंद्रियों द्वारा पूरा करे। मनुष्य का यह अधिकार जन्मसिद्ध है। यदि वह अपने इस अधिकार का सदुपयोग नहीं करता, तो वह केवल अपना कुछ खोता ही नहीं है, बल्कि ईश्वरीय आज्ञा की अवहेलना करने के कारण पाप का भागी बनता है।

🔴 कर्म करना मनुष्य का अधिकार है, परन्तु इसके विपरीत कर्म को छोड़ देने में वह स्वतंत्र नहीं है। किसी प्रकार भी कोई प्राणी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। यह हो सकता है कि जो कर्म उसे नहीं करना चाहिए, उसका वह आचरण करने लगे। ऐसी अवस्था में स्वभाव उसे जबरदस्ती अपनी ओर खींचेगा और उसे लाचार होकर यन्त्र की भाँति कर्म करना पड़ेगा। 

🔵 गीता में भगवान ने कहा है-यदि तू अज्ञान और मोह में पड़कर कर्म करने के अधिकार को कुचलेगा, तो याद रख कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म के अधीन होकर तुझे सब कुछ करना पड़ेगा। ईश्वर सब प्राणियों के हृदय प्रदेश में बसा हुआ है और जो मनुष्य अपने स्वभाव तथा अधिकार के विपरीत कर्म करते हैं, उनको यह माया का डंडा लगातार इस प्रकार घुमा देता है, जैसे कुम्हार चाक पर पऱ चढ़ाकर एक मिट्टी के बर्तन को घुमाता है। 

🌹 -अखण्ड ज्योति-अक्टू. 1946 पृष्ठ 17

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